सांबा। बाबा चमलियाल दरगाह को पर्यटन मानचित्र पर लाने की मांग की गई है। दरगाह के सेवादारों ने इस दरगाह को आरएस पुरा की ऑक्ट्राय पोस्ट की भांति गेट बनाने और मार्गों की मरम्मत कराई जाने का भी अनुरोध किया है। ताकि पर्यटकों का रुझान दरगाह की ओर बढे़। सेवादारों ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी एक बार दरगाह पर माथा टेक कर इस स्थान को पर्यटन मानचित्र पर लाने का वादा किया था।
जिले में भारत-पाकिस्तान सीमा से सटी दरगाह बाबा चमलियाल में प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का आना जाना रहता है। कोविड-19 के चलते दूसरी बार मजार को आम लोगों के लिए नहीं खोलने के प्रशासन के निर्णय से श्रद्धालु काफी परेशान हैं।
सांबा के नीतिन, राहुल, दिनेश ने बताया कि वह प्रत्येक वर्ष बाबा चमलियाल मेले में पहुंच कर माथा टेकते थे। वहां का शक्कर शर्बत लाते थे। उनके रिश्तेदार को चंबल रोग हो गया था। हमें बताया गया कि मेले के दौरान बाबा की दरगाह से शक्कर शर्बत लाकर 21 दिन लेप करें व पूरा परहेज रखने के बाद चंबल रोग ठीक हो जाता है। उन्होंने भी वैसा ही किया। वह ठीक हो चुके हैं। मेला नहीं किए जाने से वह लोग निराश हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने कई अन्य लोगों को इस बारे में बताया कि शक्कर शर्बत से चंबल रोग ठीक हो जाता है।
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बाबा चमलियाल दरगाह को भी आरएस पुरा के सुचेतगढ़ जैसा पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए। जहां पर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गेट लगाया जाए। किसी अहम मौके पर बीएसएफ व पाकिस्तानी रेंजर आपस में एक दूसरे को मुबारक बाद दे सकें। ताकि आम लोगों को भी बाबा चमलियाल दरगाह की जानकारी मिले। दरगाह पर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक स्थल को पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए। वहीं जिला प्रशासन कोविड एसओपी की पालन करते हुए कमेटी के सदस्य ही बाबा की मजार पर चादर चढ़ाएंगे।
-बिल्लू चौधरी, बाबा चमलियाल प्रबंधन कमेटी के सदस्य
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अन्य राज्यों तक भी मेले की महानता
बाबा चमलियाल मेले की महानता जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त देश के अन्य राज्यों तक भी है। मेले में दूर दराज से भी श्रद्धालु पहुंच कर माथा टेकते हैं। यहां की शक्कर शर्बत साथ लेकर जाते हैं। दूर दराज के लोगों की मन्नतें पूरी होने पर ढोल व बैंडबाजे के साथ श्रद्धालु बाबा की मजार तक पहुंचते हैं।
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बीएसएफ के बैंड की धुन के साथ चादर ली जाती थी
बाबा चमलियाल मेले में दोनों देश के श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है। पाकिस्तानी श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष चादर रेजरों के माध्यम से बीएसएफ के अधिकारियों को साैंपते हैं। बीएसएफ के बैंड की धुन के साथ चादर ली जाती है। बैंड बजने से जीरो लाइन पर दोनों देश के श्रद्धालु सुनते हैं। उस चादर को पूरे रीति रिवाज के साथ मजार पर चढ़ाया जाता है।
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जवान मजार पर लाते थे ट्रैक्टर ट्रालियां
पाकिस्तानी श्रद्धालु अपनी ट्रैक्टर ट्राली जीरो लाइन पर छोड़ देते हैं। बीएसएफ के जवान ट्रैक्टर ट्रालियों को मजार पर लाते हैं। उनमें शक्कर शर्बत भर कर जीरो लाइन पर छोड़ देते। वहां से पाकिस्तानी श्रद्धालु अपने क्षेत्र में ले जाकर अन्य लोगों में बांटते हैं। गत तीन वर्ष से पाकिस्तानी श्रद्धालुओं को शक्कर शर्बत नहीं भेजी जा रही है। इससे उन्हें भी काफी परेशानी बनी हुई है।
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लोगों के कारोबार पर लगा ग्रहण
रामगढ़। बाबा की मजार के रास्ते पर सैकड़ों की संख्या में लोगों ने दुकानें सजा रखी हैं। जो दो दिन पहले ही पहुंच जाते थे। खानपान, बच्चों के खिलौने, विभिन्न प्रकार की दुकानें सजी रहती थीं। झूले का आनंद भी श्रद्धालु उठाते थे। जिला प्रशासन की ओर से बिजली, पानी के साथ सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए जाते हैं। मेले के लिए दुकानदार पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं, लेकिन कोरोना महामारी ने उनके कारोबार पर ग्रहण लगा दिया है। मेले के रद्द होने से उन्हें भी काफी मयूसी हुई है।
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित दरगाह बाबा चमलियाल मेले के दौरान जीरो लाइन पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जिसमें बीएसएफ के अधिकारी व पाकिस्तानी रेंजर के साथ सिविल प्रशासन के अधिकारी भी पहुंचते हैं। एक दूसरे को उपहार दिए जाते हैं। पाकिस्तान की ओर से लाहौर की मशहूर मिठाई तो बीएसएएफ की ओर से जम्मू के मशहूर हलवाई की मिठाई दी जाती है। दोनों देश के सुरक्षा अधिकारी व प्रशासनिक अधिकारी काफी खुश दिखाई देते हैं। दोनों देशों के सुरक्षा बल के अधिकारी संयुक्त प्रेसवार्ता भी करते हैं। बाबा की महानता के बारे में बताते हैं, लेकिन इस बार ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलेगा।