सांबा। 16 दिसंबर, 1971 को बसंतर दरिया के सामने वह दुश्मन के सामने सीना तान कर खड़ा था। परिस्थितियां विपरीत होने की वजह सीनियर्स बार-बार उसे टैंक छोड़कर बाहर आने के लिए कह रहे थे। मगर वह हिला नहीं। उसने जवाब दिया, मेरी गन अभी भी काम कर रही है। अगले ही पल वह दुश्मन पर टूट पड़ा और एक के बाद एक चार पाकिस्तानी टैंक ध्वस्त कर दिए। वह कुछ और टैंकों को निशान बनाता, इससे पहले दुश्मन ने उसे टारगेट कर लिया। वह जब तक जिंदा रहा, पाकिस्तानी टैंक उसे पार नहीं कर सके। उसकी इस वीरता के लिए भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र दिया गया।
1971 के आखिरी महीनों में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति हो गई थी। सेना को इसका अंदाजा था। लिहाजा उसने अहमदनगर में यंग ऑफ़िसर्स कोर कर रहे सैनिक अफ़सरों को कोर्स ख़त्म होने से पहले ही रेजिमेंट में भेज दिया। अरुण खेत्रपाल इन्हीं में से एक थे। कुछ दिन बाद पाकिस्तानी सेना ने हमला कर दिया। सेना ने मोर्चा संभाला। जरूरत पड़ने पर 16 दिसंबर 1971 को 17 पूना हार्स को 47 वीं इंफेंट्री ब्रिगेड की कमान भेजा गया। यह यूनिट पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ सेक्टर में दुश्मन से लोहा ले रही थी।
जल्द ही 17 पूना हार्स को आदेश मिल गया। मगर अरुण को सीधे लड़ाई में शामिल होने अनुमति नहीं थी। उन्हें जब पता चला तो वह कमांडर हनूत सिंह से मिले और कारण पूछा। हनूत सिंह ने बताया कि उनके पास युद्ध का अनुभव नहीं है, न ही उन्होंने यंग ऑफ़ीसर्स कोर्स पूरा किया है। अरुण निराश हो गए, उन्होंने हनूत सिंह से आग्रह किया कि वह उन्हें युद्ध में जाने दें। अरुण ने तर्क दिया कि अगर वह युद्ध में भाग नहीं ले पाए तो शायद ही उन्हें ऐसा मौका न मिले। अंतत: हनूत मान गए।
16 दिसंबर की सुबह पूना हॉर्स के टैंकों ने धीरे-धीरे दुश्मन की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। दुश्मन को अंदाजा न हो, इसके लिए सभी लाइटें बंद रखी गईं। इस बीच 16 मद्रास के कमांडिंग ऑफ़िसर ने सूचना दी कि बड़े हमले के लिए पाकिस्तान के टैंक इकट्ठे हो रहे हैं। ऐसे में देरी हमें महंगी पड़ सकती है। कैप्टेन मल्होत्रा, लेफ़्टिनेंट अहलावत और सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय था। खै़र, साहस के साथ सेना के ये अफसर आगे बढ़े और दुश्मन के टैंक उड़ाने शुरू कर दिए। भारतीय टैंक फ्रंटफुट पर आए ही थे कि दुश्मन द्वारा फेंका एक गोला अहलावत के टैंक पर आ गिरा और वह आग के हवाले हो गए। अरुण मदद के लिए आगे बढ़ते इससे पहले एक गोला उनके टैंक पर भी गिरा। यह देखकर कैप्टेन मल्होत्रा ने उन्हें टैंक छोड़कर बाहर आने को कहा। मगर खेत्रपाल नहीं माने, अपना रेडियो रिसीवर बंद करते हुए वह दुश्मन पर हमलावर हो गए। उनके आखिरी शब्द थे. मेरी गन अभी काम कर रही है, जोश और जज़्बे से लबरेज अरुण ने देखते ही देखते पाकिस्तानी सेना के चार टैंक उड़ा दिए। वह कुछ और टैंकों को निशाना बनाते इससे पहले दुश्मन का एक गोला उन पर आ गिरा और वह शहीद हो गए। मरणोपरांत उन्हें वीरता के सबसे बड़े पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।