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मई दिवस पर भी फैक्ट्रियों ने मजदूरों को नहीं दी मदद

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सांबा। कस्बे में पहले मई दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था। मजदूरों को पेश आने वाली परेशानियों को सुना जाता था, लेकिन अब कोरोना वायरस की रोकथाम के कारण देश भर में किए लॉकडाउन के चलते मजूदर दिवस का आयोजन तो नहीं किया गया, लेकिन लेबर संगठनों के पदाधिकारियों ने मई दिवस पर कारखाना प्रबंधकों पर निशाना जरूर साधा गया।
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कांग्रेस लेबर सेल के प्रदेश महासचिव गंभीर सिंह ने कहा कि लॉकडाउन से सबसे प्रभावित मजदूर वर्ग हुआ है, लेकिन कुछ समाजसेवी लोगों व संस्थाओं के अलावा प्रशासन व औद्योगिक इकाइयों द्वारा मजदूरों को किसी भी प्रकार का आर्थिक पैकेज या राहत सामग्री प्रदान नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के कारण यह मजदूर एक माह से बेकार बैठे हैं, और सरकार ने फैक्टरी प्रबंधकों को ऐसे मजदूरों को आर्थिक सहायता देने के साथ राहत सामग्री प्रदान करने की बात कही थी, परंतु आज तक सांबा में एक आध कारखाने के अलावा अन्य औद्योगिक इकाई ने मजदूरों को न तो आर्थिक मदद दी और न ही इनके लिए राशन या लंगर की व्यवस्था की। उन्होंने कहा कि दिखावा करने के लिए यह फैक्ट्रियां प्रधानमंत्री कोष में लाखों रुपये जमा करा रही हैं, परंतु मजदूरों को दो वक्त की रोटी देने के लिए इनके पास पैसे नहीं हैं। उन्होंने कहा कि आज मजदूर दिवस मनाया जाता है और ऐसे में लॉकडाउन में सबसे प्रभावित मजदूरों को अभी तक कोई बड़ा आर्थिक या राहत पैकेज प्रदान नहीं किया गया है। जो निंदनीय है। उन्होंने उपराज्यपाल जीसी मुर्मू से मजदूरों के लिए आर्थिक पैकेज देने की मांग की है।
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लॉकडाउन के दौरान मजदूरों का समर्थन करने की अपील
संवाद न्यूज एजेंसी
सांबा। मई दिवस पर मजदूरों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के नेताओं ने केंद्र सरकार से कोविड-19 के बीच मजदूरों और जरूरतमंद लोगों को समर्थन देने की अपील की। जेकेएपी के नेताओं ने एक बयान में कहा कि जम्मू-कश्मीर सहित देश में चल रहे लॉकडाउन के कारण मजदूरों को बहुत नुकसान हुआ है।
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मौजूदा स्थिति के तहत, सरकार को मजदूरों का समर्थन करना चाहिए। जेकेएपी के नेताओं ने कहा कि मई दिवस पर हम समाज के लिए श्रमिकों के योगदान और बलिदान का जश्न मनाते हैं। मई दिवस को 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मजदूरों के संघर्ष और उसके बाद के सशक्तीकरण के पर्याय के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में श्रमिक श्रम कानूनों, श्रमिकों के अधिकारों के उल्लंघन, काम करने की खराब स्थिति और काम के घंटों के खिलाफ आंदोलन के लिए दिन महत्वपूर्ण है। जम्मू और कश्मीर में श्रमिकों ने भी संघर्ष किया है और गैर-पंजीकृत कार्यबल को पंजीकृत किया जाना चाहिए ताकि उन्हें सरकार की सुविधाएं भी प्रदान की जा सकें। भारत में एक मई 1923 से लोगों ने मई दिवस को देखना शुरू कर दिया। बयान जारी करने वालों में एजाज अहमद खान, चौधरी जुल्फिकार अली, हाजी मुमताज अहमद, विक्रम मल्होत्रा, कमल अरोड़ा, नम्रता शर्मा, रकीक खान, और अन्य शामिल हैं।
मजदूरों को संगठित होने का दिया संदेश
-मई दिवस
संवाद न्यूज एजेंसी
आरएस पुरा। माकपा नेता किशोर कुमार ने मजदूर वर्ग से कहा कि उन्हें संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए आगे आना चाहिए। मई दिवस यानी मजदूर दिवस की शुरुआत एक मई 1886 को अमेरिका से मानी जाती है। श्रमिकों को सुविधा एवं सहूलियत को लेकर शुरू हुए मजदूर दिवस की परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने वाले बुजुर्गों के लिए कोई मायने नहीं रखती है। उनका लक्ष्य दिनभर की जाने वाली मेहनत के एवज में मिले श्रमांश से परिवार को पालना पोसना होता है।
गांवों से लेकर शहर तक श्रमिक काम की तलाश में सुबह चौक चौराहों पर पहुंच जाते हैं। वहीं रोजगार की गारंटी देने वाली मनरेगा में पंजीकृत श्रमिकों में बुजुर्ग श्रेणी में दर्ज श्रमिकों की ओर से वित्तीय वर्ष 2018-19 में 10 हजार 378 दिन काम मिला, जबकि चालू वित्तीय वर्ष में 736 दिन काम किया है। उन्होंने कहा कि अधिकतर मजदूरी करने वाले लोग पढ़े-लिखे नहीं सरकार द्वारा ऑनलाइन के चलते उन्हें पंजीकृत करवाने के लिए परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार को चाहिए कि कम से कम पंजीकृत मजदूरों को राहत देने के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं का लाभ पहुंचाया जाए ताकि मजदूर वर्ग के लोग अपने परिवार का पालन पोषण कर सकें। उन्होंने कहा कि इस समय कोरोना वायरस की महामारी के चलते सबसे अधिकतर मजदूर वर्ग के लोगों को सामना करना पड़ रहा है। हालांकि सरकार द्वारा मजदूर वर्ग के लोगों को निशुल्क राशन मुहैया कराया जा रहा है, लेकिन उनकी अन्य जरूरतें पूरी नहीं हो पा रहीं।
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