वेटलैंड में विचरण करते प्रवासी पक्षी।
आरएस पुरा। मौसम बदलते ही घराना वेटलैंड से विदेशी परिंदे अपने वतन लौटने लगे हैं। वेटलैंड के किनारे इनका कलरव थमने लगा है। ठंडे देशों में बर्फ पड़ने से दाना-पानी के लिए अक्तूबर-नवंबर से हजारों किलोमीटर दूर का सफर तय कर ये परिंदे घराना वेटलैंड में सर्दी के मौसम में ठहरते हैं और मार्च-अप्रैल तक लौट जाते हैं। इस बार घराना वेटलैंड में करीब 20 हजार प्रवासी पक्षियों ने यहां डेरा डाला। इनमें सबसे अधिक संख्या में वार हैडेड वीग की रही। अब तक 80 फीसदी पक्षी वापस जा चुके हैं। साइबेरियन पक्षियों के इलाके में आने से रंग-बिरंगे दुर्लभ प्रजाति के पक्षी प्राकृतिक छटा को मनोहारी बना देते हैं। सर्दी के मौसम में नदियों के किनारे इन पक्षियों के दुर्लभ नजारे लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेते हैं।
अब क्षेत्र में गर्मी में बढ़ते ही ये विदेशी परिंदे लौटने लगे हैं। गांव के निवासी राकेश कुमार का कहना है कि तालाब के भीतर और इसके ऊपर मंडराने वाले पक्षी काफी कम ही नजर आ रहे हैं। खाने की तलाश और बर्फबारी से बचने के लिए ये पक्षी गर्म देशों की शरण में आते हैं। जहां कुछ समय मेहमानदारी के बाद जब वहां सर्दी कम होती है और भोजन आसानी से प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है, तो ये वापस लौट जाते हैं। इतनी लंबी उड़ान भरकर बिना भूले-भटके ये परिंदे अपने गंतव्य स्थल तक पहुंचते हैं। रंग-बिरंगे इन पक्षियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये अपनी यात्रा रात में करना ज्यादा पसंद करते हैं।
गांव के बुजुर्ग समाराम का कहना हैै कि जब ये लौटते हैं तो नर पक्षी पहले रवाना होते हैं और जब आते हैं तो मादा आगे होती है। यात्रा के दौरान रात में ये पक्षी तारों व चंद्रमा की स्थिति से मार्ग निर्धारण करते हैं। इन पक्षियों का मुख्य भोजन पानी के अंदर पाई जाने वाली वनस्पतियां, मछलियां व नदी किनारे उगने वाली मुलायम घास है। श्रवण शक्ति के भी ये धनी माने जाते हैं और प्रदूषित वातावरण से बचने की क्षमता भी इनमें काफी बताई जाती है।
बता दें कि मेहमान प्रवासी पक्षी मैदानी इलाकों के जलाशयों व नदियों के तटों पर आने का यह सिलसिला काफी पुराना है। इन पक्षियों में जलीय मुर्गी, साइबेरियन बतखें, सारस, बहरी चिड़ियां, गुलाबी मैना, सुर्खाब, कूट्स आदि हैं। इनके यहां आने का प्रमुख कारण उत्तरी यूरोप व मध्य एशिया तथा अन्य पश्चिमी देशों में ठंड बढ़ना व तापमान शून्य तक पहुंच जाने के बाद अनुकूल वातावरण की तलाश है। तापमान शून्य तक पहुंच जाने से यहां बर्फ जमने लगती है और इन पक्षियों को भोजन मिलना दुर्लभ हो जाता है।