आरएस पुरा। गांव दवलैड में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में बुधवार को कथा वाचक संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि सत्संग के मायने सुख का संग, और सुख हमें प्रिय है। प्रियता अपने में व अपने से ही होती है। जो सदा है। है का संग करना ही सत्संग है। असल अपना था नहीं, और रहेगा भी नहीं।
शास्त्री जी ने कहा कि एक क्षण का सत्संग भी मनुष्य को अपार सुख की अनुभूति करा सकता है। एक क्षण का कुसंग मनुष्य को बड़े दुख में डाल सकता है। सत्संग के माया मनुष्य महज ही इस भवसागर से पार हो जाता है। कुसंग मनुष्य के पतन का ही कारण होता है। कुसंग का संग दुख देने वाला है। संत का संग सुख देने वाला है। शास्त्री जी ने आगे कहा कि उतना सुख अभी आपको नहीं मिल रहा, क्योंकि अभी हो हम सत्य की चर्चा कर रहे हैं। सत्य का संग तो आपने ही करना है और जब करोगे, तो सुख भी पाओगे। इसलिए पहले आम सत्य को अच्छी प्रकार समझ लें, जान लें। जब ठीक प्रकार से सुर को पहचान जाओगे, तब यह भी जान जाओगे कि हम असंग नहीं, सत्य से अलग हुए ही नहीं और हो सकते भी नहीं। सत्य का संग तो स्वत: है। सत्य का संग नित्य है, सत्य का संग सदा है। जिसे इस बात का इस रहस्य का पता है, वह सुखी है। हमें इस रहस्य का पता अज्ञान के कारण नहीं है।