- बर्खास्तगी का कारण बने चिकित्सा साक्ष्यों की उचित जांच न करने को बताया गलत
- सरकार को दिया आठ सप्ताह के भीतर फिर से जांच करने का आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) ने एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी के 24 साल पुराने आदेश को रद्द किया है। कैट का कहना है कि याचिकाकर्ता को बर्खास्त करते समय बर्खास्तगी का कारण बताए गए चिकित्सा साक्ष्यों की उचित जांच नहीं की गई। न ही याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का उचित मौका दिया गया। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हैं।
पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर तैनात सांबा निवासी बहादुर हुसैन ने साल 2004 में हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसे 2020 में कैट में हस्तांतरित कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि तत्कालीन एसएसपी, रियासी ने पांच जनवरी, 2001 को एक आदेश जारी कर उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। आदेश में बिना बताए कई दिनों तक नौकरी से अनुपस्थित रहने को बर्खास्तगी का कारण बताया गया। जबकि वह उस दौरान उप-अस्पताल, बिश्नाह में उपचाराधीन था। इस संबंध में जरुरी चिकित्सा प्रमाण पत्र भी उसने अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किए। फिर भी बिना पूरी जांच और कोई नोटिस जारी किए उसे बर्खास्त कर दिया गया। मामले में प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता लगातार बिना बताए अनुपस्थित रहने का आदी था। लगातार तीन बार दण्डित होने के बाद भी उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। इसलिए उसे नौकरी से हटाने का आदेश दिया गया।
सुनवाई के बाद मामले का फैसला सुनाते हुए कैट के न्यायिक सदस्य राजिंदर सिंह डोगरा ने कहा कि याचिकाकर्ता की ड्यूटी से बार-बार अनुपस्थिति खेदजनक है, लेकिन प्रतिवादी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने में विफल रहे हैं। याचिकाकर्ता के चिकित्सा प्रमाण पत्र दर्शाते हैं कि अनुपस्थिति के दौरान वह अपना इलाज करा रहा था। प्रतिवादियों ने इसकी जांच करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। पूरी तरह जांच किए बिना नौकरी से बर्खास्त करना बेहद कठोर और असंगत है। इसी के साथ कैट ने निलंबन के आदेश को रद्द करते हुए मामले की आठ सप्ताह के भीतर फिर से जांच करने का आदेश दिया है।