हाईकोर्ट ने कहा - हिरासत में रखने के लिए पुलिस ने किया पीएसए का दुरुपयोग
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत निवारक हिरासत में लिए व्यक्ति को रिहा करने का आदेश देते हुए पुलिस की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस ने अदालतों को मात देने और ''विकृत हिरासत'' में लेने के लिए पीएसए का सहारा लिया है। विकृत हिरासत का मतलब ऐसी स्थिति से है, जहां हिरासत की कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जाता है।
जम्मू के छन्नी हिम्मत निवासी तरुण बहल को पीएसए के तहत हिरासत में लेने का आदेश जिला मजिस्ट्रेट जम्मू की ओर से पांच सितंबर, 2024 को पारित किया गया था। इसके बाद छह सितंबर को उसे हिरासत में लेकर कोट भलवाल केंद्रीय जेल में भेज दिया गया। तरुण की पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसी पर फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश राहुल भारती ने यह टिप्पणी की है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि जम्मू के एसएसपी और डीएम ने याचिकाकर्ता को निवारक हिरासत के अधीन करके उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला करने के लिए अपने अधिकार का संदिग्ध प्रयोग किया गया है।
हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत के दस्तावेजों की जांच करने के बाद पाया कि एसएसपी की ओर से प्रस्तुत पहले डोजियर को आदेश पारित करने के लिए अपर्याप्त होने की वजह से डीएम ने वापस कर दिया था। इसके बाद संशोधित डोजियर प्रस्तुत किया गया, जिसमें धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के नाम पर कई बैंक खाते हैं। इसी के आधार पर याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने का आदेश पारित किया गया।