रियासत के आरक्षण अधिनियम के तहत बनाए गए आरक्षण नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बोर्ड आफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्जाम (बीओपीईई) को पोस्ट एडमीशन मुद्दे पर नोटिस जारी किया।
चीफ जस्टिस एमएम कुमार और जस्टिस धीरज सिंह ठाकुर की खंडपीठ ने बोर्ड को नियमों पर फिर से कार्य करने को कहा है। बोर्ड के डिप्टी सेक्रेटरी (लीगल) ने हलफनामा दायर करते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षित वर्ग की सीटों में किसी तरह की वृद्धि नहीं की गई है।
स्पष्टीकरण की अंतिम पंक्तियों में दर्शाया गया कि एक सीट के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की गई थी, जिसमें आरक्षित वर्ग के एक छात्र ने ओपन वर्ग में आवेदन किया था, क्योंकि उसके द्वारा अर्जित अंक आरक्षण वर्ग से ज्यादा थे। छात्र ने एमडी मेडिसिन में विशेषज्ञता वर्ग को चुना था, जो आरक्षण वर्ग में उपलब्ध थी।
ओपन मेरिट कैटेगरी कैंडीडेट के कारण उसने आरक्षण वाले विकल्प को सरेंडर कर दिया। इसी कारण आरक्षण वर्ग में एक सीट का इजाफा हुआ था, दो याचिकाकर्ता ने मांगी थी। खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने उक्त सीट पर दावे के लिए हलफनामा दायर किया है।
ऐसा पाया गया कि आरक्षित वर्ग के किसी छात्र को ओपन मेरिट कैटेगरी वर्ग में शामिल किए जाने से आरक्षित वर्ग का कोटा बढ़ता है। एडवोकेट केएस परिहार के अनुसार इस तरह प्रत्येक विशेषज्ञ वर्ग में आरक्षण वर्ग के लिए तय कोटा बढ़ जाएगा।
खंडपीठ ने पाया कि जेएंडके आरक्षण नियम-2005 के नियम 17 के तहत प्रथम दृष्टयता में कोटा बढ़ाने के परिणाम हत्तोसाहित करने वाले हैं। अदालत का मानना है कि आरक्षण वर्ग और ओपन कैटेगरी तय औसत के आधार पर ही रहना चाहिए।
बोर्ड को भी इसे लागू करना चाहिए। अदालत ने बोर्ड को निर्देश दिए कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संबंध में दिए गए आदेश के अनुसार नियमों पर कार्य करे।
जेएनएफ