हाईकोर्ट की फुल बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के पास ठगी के मामले में पुलिस से जांच करवाने का अधिकार है, बशर्ते आयोग के समक्ष धोखाधड़ी के कागजात पेश हों। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एन पाल वसंथाकुमार, जस्टिस मुजफ्फर हुसैन अत्तर और जस्टिस एएम माग्रे की फुल बेंच ने फैसले में कहा कि जेएंडके कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 1987 के तहत अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के पास मिली शिकायत के निर्णायक समय पर कमीशन जारी कर रिपोर्ट मांग सकता है।
फुल बेंच का फैसला दायर हुईं कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया, जिसके लिए विशेष तौर पर फुल बेंच का गठन किया गया। हाईकोर्ट की श्रीनगर विंग की खंडपीठ की ओर से जारी सीआईएमए पर मुद्दा उठा था कि क्या राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग पुलिस को केस रजिस्टर्ड करने और उसकी जांच करने के आदेश दे सकता है या नहीं। इसके अलावा किसी केस का फैसला करने के लिए आयोग एक कमीशन बैठा कर रिपोर्ट तलब कर सकता है या नहीं।
बेंच ने कहा कि संभागीय फोरम या प्रदेश आयोग सिविल कोर्ट की तरह आरपीसी की धारा 193 और 228 के तहत अपने अधिकार का उपयोग कर सकता है। एक बार कोई मामला सिविल कोर्ट की तरह व्यवहार में लाया जाता है तो आयोग को डिवीजनल फोरम की ओर से अपनाए जाने वाली कार्यप्रणाली को अपनाना होगा। कानून में यह व्यवस्था है कि किसी विवाद को हल करने के समय कोर्ट और न्यायिक फोरम सच्चाई तक पहुंचने के लिए अपने कर्तव्य का निर्वाह करें। जेएनएफ