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जम्मू-कश्मीर: अब पेड़ों की भी होगी डिजिटल पहरेदारी, चिनार को नुकसान पहुंचाया तो तुरंत वन विभाग को मिलेगा अलर्ट

Sat, 07 Nov 2026 12:41 PM IST
Nikita Gupta अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

जम्मू-कश्मीर में चिनार, बरगद और पीपल के पेड़ों को अवैध कटान से बचाने के लिए जियो-टैगिंग और क्यूआर कोड के जरिए डिजिटल निगरानी की जा रही है। अब तक करीब 30 हजार चिनार और जम्मू संभाग के 3,500 पीपल-बरगद के पेड़ों को इस अभियान में शामिल किया गया है।
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श्रीनगर के निशात गार्डन में शरद ऋतु का लुत्फ लेते पर्यटक। - फोटो : बासित जरगर
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विस्तार
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प्रदेश में चिनार, बरगद और पीपल के पेड़ों की निगरानी जियो-टैगिंग से होगी। पेड़ों को अवैध कटान से बचाने के लिए यह फैसला लिया गया है। इस अभियान में अब तक कश्मीर में 10000 चिनार के पेड़ों और जम्मू संभाग में 3500 पीपल और बरगद के पेड़ों पर क्यूआर प्लेटें लगाई गई हैं।

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प्रदेश में लगभग 30000 चिनार के पेड़ों की जियो-टैगिंग की गई है और एक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया गया है। डेटाबेस में शामिल पेड़ों को कोई नुकसान होता है तो इसकी जानकारी तत्काल विभाग मुख्यालय पहुंच जाएगी। इसके साथ ही पेड़ों को नुकसान से बचाने और उनके संरक्षण के लिए भी कदम उठाए जा सकेंगे। वन विभाग संरक्षित वन क्षेत्र को बरकरार रखने पर भी काम कर रहा है।

प्रदेश के 20 जिलों में 4861.282 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 50 संरक्षित क्षेत्रों का एक संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क है। इसमें 4 राष्ट्रीय उद्यान, 14 वन्यजीव अभयारण्य, 16 संरक्षण रिजर्व और 16 आर्द्रभूमि (पानी से भरे) रिजर्व शामिल हैं। मंत्री को बताया गया कि प्रदेश में 4440 पौधों की प्रजातियां, 111 स्तनधारी प्रजातियां, 608 पक्षी प्रजातियां, 68 सरीसृप (रेंगने वाले), 14 उभयचर, 308 तितली और 100 मछली प्रजातियां पाई जाती हैं।
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अकेले पक्षियों की प्रजातियां भारत की कुल पक्षी विविधता का 44 प्रतिशत है। केंद्र शासित प्रदेश में 10 दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियां हैं, इनमें 4 गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियां शामिल हैं। जिनमें हंगुल, कश्मीरी कस्तूरी मृग, मार्कहोर और एशियाई आइबेक्स शामिल हैं।

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पेड़ों, दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण आवश्यक : वानी
वन, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री अल्ताफ अहमद वानी ने कहा, पेड़ों और दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए कदम उठाए जाने आवश्यक हैं। कहा, जम्मू-कश्मीर दुनिया की कुछ दुर्लभ प्रजातियों का घर है। हंगुल दुनिया में कहीं और नहीं पाया जाता। यह प्रदेश का गौरव और पहचान है। इसे खोने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। उन्होंने विभाग को वैज्ञानिक निगरानी और आवास सुधार के साथ मिशन मोड में हंगुल संरक्षण का कार्य शुरू करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा, विज्ञान वन संरक्षण की रीढ़ है और अनुसंधान केवल फाइलों और प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
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