छड़ी मुबारक भद्रवाह से कैलाश कुंड के लिए रवाना
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कोरोना महामारी के संकट के बीच तीन दिवसीय कैलाश यात्रा डोडा जिले के भद्रवाह से रविवार सुबह को प्रारंभ हो गई। भद्रवाह के गाथा में प्राचीन वासुकि नाग मंदिर में मंत्रोच्चारण के बाद छड़ी मुबारक 14700 फीट की ऊंचाई पर स्थित कैलाश कुंड के लिए रवाना हो गई। हयान-नालती में एक रात रुकने के बाद यात्रा अपने पवित्र स्थल पर पहुंचेगी और श्रद्धालु डल झील के जल में स्नान करेंगे। अनुष्ठान के बाद यात्रा वापस 18 अगस्त को भद्रवाह के लिए रवाना होगी।
इस यात्रा में कोरोना महामारी के कारण पाबंदियों का पालन करते हुए इस बार बहुत ही सीमित संख्या में लोगों को जाने की अनुमति मिली है। लोग सामाजिक दूरी और मास्क लगाने के नियमों का पालन कर रहे हैं। गाथा स्थित वासुकि नाग मंदिर से रविवार की सुबह लगबग 8.30 बजे पवित्र छड़ी आगे के लिए रवाना हुई। इसके बाद वासुकी नाग मंदिर वासिक डेरा से भी एक छड़ी इसमें शामिल हुई। इस यात्रा में पूर्व एमएलसी और वजीर वासुकी नाग मंदिर वासिक ढेरा नरेश कुमार गुप्ता,धर्म सभा के अध्यक्ष वरिंदर राजदान, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ घाटी और आसपास के क्षेत्रों के तीर्थयात्री शामिल हैं। यात्रा की कड़ी सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं।
देश के अन्य हिस्सों से शामिल होते थे यात्री
उल्लेखनीय है कि हर साल प्रदेश के अलावा बड़ी संख्या में देश के दूसरे हिस्सों के श्रद्धालु भी इस इस प्राचीन तीर्थ यात्रा में शामिल होते हैं। परंतु इस बार कोरोना के कारण प्रशासन ने केवल छड़ी मुबारक को कैलाश कुंड तक ले जाने की अनुमति दी है।
डेढ़ मील की परिधि में फैला है कुंड
कैलाश कुंड समुद्र तल से 14,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, तथा डेढ़ मील की परिधि में फैला है। यह बर्फ से ठंडे पानी का क्रिस्टल का कुंड है और मान्यता है कि यह स्थान भगवान शिव का मूल निवास था, लेकिन भगवान शिव ने इसे वासुकी नाग को दे दिया और खुद भरमौर (हिमाचल प्रदेश) मणिमहेश में रहने के लिए चले गए।
21 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई
कैलाश यात्रा श्रावण पूर्णिमा के चौदहवें दिन शुरू होती है। इसे सबसे कठिन तीर्थयात्रा माना जाता है क्योंकि तीर्थ यात्रियों को कुंड तक पहुंचने के लिए 21 किलोमीटर की खड़ी कैलाश पर्वत श्रृंखला पार करनी होती है।