श्रीनगर और अनंतनाग लोकसभा सीट उपचुनाव ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और पीडीपी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दोनों ही सीटें पार्टी के कब्जे में रही हैं और दोबारा इन सीटों पर कब्जा करना पार्टी के लिए नाक का सवाल बन गया है।
खासकर भाजपा से गठबंधन के बाद घाटी में हो रही आलोचनाओं के बाद यह स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद के निर्णय और पीडीपी-भाजपा गठबंधन की प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया है। सरकार चाहती थी कि उपचुनाव पंचायत चुनावों के बाद हों ताकि पंचायत चुनाव में मिली कामयाबी का फायदा उपचुनाव में पार्टी को मिल सके। साथ ही संगठन में मचे उथल पुथल को शांत करने का भी मौका मिल जाए।
पीडीपी में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में आए मुफ्ती के बेटे और महबूबा के भाई तसद्दुक मुफ्ती का अनंतनाग सीट से लड़ना तय माना जा रहा है। ऐसे में इस सीट पर जीत हासिल करना पार्टी के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा क्योंकि दक्षिणी कश्मीर में पार्टी का जबर्दस्त वर्चस्व रहा है। महबूबा इस सीट से पिछले दो चुनाव में लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। कश्मीर हिंसा के बाद श्रीनगर से पीडीपी सांसद तारिक हमीद कर्रा ने पार्टी के निर्णयों से खफा होकर इस्तीफा दिया। इसके बाद महबूबा सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार से नाराज होकर बशारत बुखारी और मौलवी इमरान रजा अंसारी ने इस्तीफा दिया। बशारत तो मान गए हैं, लेकिन इमरान अंसारी ने अभी इस्तीफा वापस नहीं लिया है। बताया जाता है कि उमरा से लौटने के बाद पार्टी उन्हें भी मना लेगी। हाल के इन दोनों घटनाओं से माना जा रहा है कि पीडीपी में अंदरखाने गुटबाजी हावी है। पीडीपी के कुछ वरिष्ठ मंत्रियों तथा संगठन के पदाधिकारियों के खिलाफ विधायकों में गुस्सा है।