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सांबा से लुप्त हो रहा हथकरघा उद्योग

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सांबा सूत कात रहे बुनकर - फोटो : SAMBA
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सांबा। केंद्र व राज्य सरकारें हथकरघा उद्योग को पटरी पर लाने के लिए बड़े-बडे़ दावे कर रही हैं, जबकि वास्तविकता बिलकुल अलग है। कभी सांबा शहर को शीटों के शहर से जाना जाता था। यहां हथकरघा उद्योग व रंगीन चादरों की छपाई, चादरों के शहर के नाम से मशहूर हुआ करता था, लेकिन अब इससे जुडे़ परिवार इस उद्योग को छोड़ अपनी आजीविका चलाने के लिए अन्य व्यवसायों की ओर रुख कर गए हैं।
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आलम यह है कि मौजूदा समय में महज पांच छह परिवार के लोग ही हथकरघा उद्योग के इस पुश्तैनी कारोबार को चलाकर अपनी आजीविका चलाने की कोशिश कर रहे हैं। वह हथकरधा उद्योग को जिंदा रखने के प्रयास में हैं। भारत-पाकिस्तान के विभाजन से पूर्व सांबा व आसपास के क्षेत्र में दस हजार परिवार हथकरघा उद्योग के जरिये चादरें बनाकर कारोबार चलाते थे, जिनमें कई आज पाकिस्तान में विस्थापित हो चुके हैं। उस दौर में कई परिवार इन चादरों पर अमिट रंगीन छपाई का काम किया करते थे। जो रियासत के अलावा देशभर के साथ मौजूदा पाकिस्तान के सियालकोट व रावलपिंडी में भी खरीदी व बेची जाती थी, लेकिन अब हालात यह हैं कि सांबा का यह महत्वपूर्ण व व्यवसाय आज पूरी तरह से दम तोड़ता नजर आ रहा है। इसको जीवित रखने लिए संबंधित विभाग या सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है।
हथकरघा उत्पाद व खादी के चलन में कमी आने व पश्चिमी संस्कृति के पहनावों के चलन के चलते आज हथकरघा उद्योग से जुडे़ बुनकरों को अपने परिवारों की गुजर बसर करना मुश्किल हो गया है। यह लोग आर्थिक तंगी झेलने को मजबूर हैं। इन परिवारों के अपने पुश्तैनी कारोबार में उचित कमाई न होने के कारण दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार की गुजर बसर करने की कोशिश में जुटे हैं।
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1970 के दशक में सरकार ने हथकरघा विकास निगम का गठन कर इस पेशे से जुडे़ बुनकरों को रोजगार देने का प्रयास किया, परंतु 90 के दशक के बाद सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाला रोजगार भी पूर्ण रूप से बंद हो गया। आज हालात यह हैं कि अधिकांश बुनकर अपने पुश्तैनी कारोबार से तौबा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हथकरघा उत्पाद तैयार करने के लिए पूरे परिवार के चार-पांच लोगों को सहयोग करना पड़ता है और पहले इससे पूरे परिवार को डेढ़ हजार से 2000 रुपये की बचत हो जाती थी। अब दिन भर में पूरे परिवार को 200 से 300 रुपये भी बचत नहीं हो रही है।
-प्रकाश, बुनकर पेशे से जुडे़
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फंड्स उपलब्ध कराने में की गई अनदेखी
सरकारी सूत्रों के अनुसार बुनकरों के उत्थान के लिए जम्मू-कश्मीर हथकरघा विकास निगम का गठन किया गया। केंद्र सरकार ने बुनकरों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये के फंड्स भी उपलब्ध कराए। स्थानीय बुनकरों का आरोप है कि उसमें भी जम्मू संभाग के बुनकरों की अनदेखी की गई। कश्मीर के शाल, साड़ी, कंबल बुनकरों के लिए बेहतर पैकेज देकर उन्हें करोड़ों रुपये के जॉब आर्डर दिए गए, जबकि जम्मू के बुनकरों के लिए चादरें, पर्दे, पिल्लो कवर व दरियां आदि तैयार कराए। उन्हें नाममात्र के फंड्स उपलब्ध कराकर उनकी अनदेखी की गई, जिससे जाहिर है कि राज्य व केंद्र शासित सरकारों का ध्यान कभी भी जम्मू संभाग की ओर नहीं गया।
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क्या कहते हैं अधिकारी
कारपोरेशन का कामकाज फंड्स की कमी के कारण कुछ बाधित जरूर रहता है,। हथकरघा विकास निगम हर संभव प्रयास करती है कि जरूरतमंद बुनकरों को रोजगार प्रदान कराए जाएं। इस आधुनिक दौर में बुनकरों के बच्चे हथकरघा उद्योग में रोजगार तलाशने की बजाय औद्योगिक इकाइयों में काम करना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें वहां दोगुने पैसे मिल जाते हैं।
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-राम कुमार शर्मा, जिला अधिकारी, हथकरघा विकास निगम, सांबा
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