- हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों की बढ़ी मांग, महिलाओं के हुनर को मिला बाजार
- गोल मार्केट में प्रदर्शनी, पारंपरिक कला संग आधुनिक जरूरतों के उत्पाद भी बने आकर्षण
संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। कलीरे, बसोहली पेंटिंग, कश्मीरी हस्तशिल्प और जूट से बने आकर्षक उत्पादों ने गोल मार्केट गांधीनगर में लोगों का ध्यान खींचा। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर आयोजित दो दिवसीय हस्तशिल्प एवं हथकरघा प्रदर्शनी में दूसरे दिन भी लोगों की अच्छी आवाजाही रही। पारंपरिक कला के साथ आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए उत्पादों की भी लोगों ने जमकर खरीदारी की।
हस्तशिल्प एवं हथकरघा निदेशालय जम्मू की ओर से आयोजित प्रदर्शनी में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से कारीगर और स्वयं सहायता समूह अपने उत्पाद लेकर पहुंचे। स्टॉलों पर कश्मीरी हस्तशिल्प, बसोहली पेंटिंग, कलीरे, जूट के बैग, क्रोशिया और मैक्रेमे से तैयार उत्पाद आकर्षण का केंद्र रहे।
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40 महिलाओं के समूह ने बनाया हुनर को रोजगार का जरिया
सांबा की ज्योति बाला ने बताया कि उनके समूह में करीब 40 महिलाएं हस्तशिल्प से जुड़ी हैं। उन्होंने कई महिलाओं को इस कला का प्रशिक्षण भी दिया है। ‘वोकल फॉर लोकल’ से प्रेरित होकर शुरू किए गए काम के तहत समूह हैंडलूम और हस्तशिल्प आधारित बैग, ब्लॉक पेंटिंग, क्रोशिया और कपड़े पर पारंपरिक पेंटिंग सहित कई उपयोगी उत्पाद तैयार कर रहा है।
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जूट ने दी महिलाओं को आत्मनिर्भरता की राह
जूट उत्पादों के साथ पहुंची मीनू कई वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। वह जूट के बैग, पाउच, लैपटॉप बैग सहित रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पाद तैयार करती हैं। उन्होंने बताया कि जूट के काम ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। साथ ही वह अन्य महिलाओं को भी इस हुनर से जोड़कर उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही हैं।
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मैक्रेमे से घर बैठे रोजगार
प्रीति ने मैक्रेमे से तैयार उत्पाद प्रदर्शनी में लगाए। उन्होंने बताया कि विशेष प्रकार के धागे को बुनाई की तकनीक से जोड़कर मैक्रेमे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इससे हैंडबैग, मोबाइल कवर, कपड़े और सजावटी सामान समेत कई उपयोगी वस्तुएं बनाई जा सकती हैं। वह अन्य महिलाओं को भी इस कला का प्रशिक्षण देकर घर से रोजगार से जोड़ रही हैं।
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परंपरा के साथ आधुनिकता का मेल
प्रदर्शनी में पारंपरिक हस्तशिल्प के साथ आधुनिक डिजाइन और रोजमर्रा के उपयोग के उत्पाद भी देखने को मिले। आयोजकों का कहना है कि ऐसे आयोजन स्थानीय कारीगरों और महिला उद्यमियों को सीधे बाजार उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। इससे पारंपरिक कला को बढ़ावा मिलने के साथ महिलाओं को अपने हुनर को आय के साधन में बदलने का अवसर भी मिलता है।