दीनानाथ नादिम के 70वें जन्म दिवस के अवसर पर जम्मू कश्मीर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा प्रकाशित अभिनंदन ग्रंत में जम्मू कश्मीर कला, संस्कृति भाषा के प्रख्यात आलोचक मोहम्मद यूसुफ ठेंग ने अपने संदेश में लिखा था कि दीनानाथ बहुत ही बड़े कश्मीरी कवि हैं।
इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि बीसवीं शताब्दी में सांस्कृतिक क्षेत्र में उनका रुतबा राजनैतिक क्षेत्र के शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के समान है। उन्होंने नादिम को कश्मीरी भाषा को पतनोन्मुख परंपराओं से मुक्त कराने का भी श्रेय दिया। साथ ही कहा कि नादिम जैसा युग पुरुष अनेक वर्षों तक पैदा नहीं होगा।
दीनानाथ नादिम का जन्म 18 मार्च 1916 को श्रीनगर के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। 1922 में उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद उनकी मां ने ही उन्हें काव्य रचना के संस्कार दिए। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मेरी मां बचपन में मुझे ललद्यद के 'वाख' और नुंद ऋषि के 'श्रुख' सुनाया करती थीं। परमानंद और कृष्ण राजदान की कविताएं सुनाकर उन्होंने मुझे सांस्कृतिक परंपरा का बोध कराया।
युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते नादिम को अंग्रेजी के जाने-माने कवि वर्डसवर्थ की कविताओं ने प्रभावित किया। इसके बाद उर्दू के कवि पंडित ब्रजनारायण चकबस्त की सुबह-ए-वतन कविता ने उन्हें आंदोलित किया। बता दें कि नादिम प्रारंभ में उर्दू में कविताएं लिखते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निधन पर उन्होंने 'कलिंग से राजघाट तक' शीर्षक से कविता लिखी। उनके कविता संग्र शिहिल कुल के लिए 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया।