पहले केंद्र में नई सरकार का गठन तो उसके बाद रियासत में भाजपा-पीडीपी की सरकार वजूद में आई। लेकिन दोनों तरफ सत्ता परिवर्तन होने का लंबा अरसा गुजरने के बावजूद भारत पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे ग्रामीणों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
कभी राज्य सरकार सीमावर्ती इलाकों के मुद्दों को केंद्र के पाले में डाल देती है तो कभी केंद्रीय सरकार राज्य सरकार पर मामला छोड़ देती है। पिछले दिन पीएमओ में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सीमा से सटे लोगों के मुद्दों के अधर में लटकने के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराकर इसी क्रम को आगे बढ़ा दिया है।
केंद्र में राज्य मंत्री डॉ. सिंह ने मार्च 2015 तक गोलाबारी की जद में आने वाले कुनबों को सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरला भूमि अलॉट करने की घोषणा की थी, लेकिन मियाद गुजरे महीनों हो चुके हैं। सुरक्षित स्थानों पर भूमि आवंटन का मामला ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। डॉ. सिंह ने बीते दिन इस मामले पर ठीकरा राज्य सरकार के सिर फोड़ दिया।
दरअसल सीमावर्ती ग्रामीणों को पाकिस्तानी गोलाबारी की विभीषिका झेलनी पड़ती है। गाहे-बगाहे ग्रामीणों को राहत दिलाने का भरोसा तो दिलाया जाता है लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती।
बॉर्डर यूनियन के सदस्यों ने इसी मसले पर पिछले दिनों जीरो लाइन से सटे 22 गांवों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी थी।
यूनियन सदस्यों की मानें तो सीमावर्ती इलाके का जीवन राज्य और केंद्रीय सरकारों की अनदेखी का शिकार हो रहा है। रक्षा और सुरक्षा कारणों से ली गई ग्रामीणों की भूमि का मुआवजा नहीं दिया गया है।
सुरक्षित स्थानों पर पांच पांच मरला भूमि का प्लाट, गांवों में ही पक्के सुरक्षित बंकर, एलओसी की तर्ज पर इंटरनेशनल बॉर्डर के लोगों को आरक्षण जैसी बुनियादी मांगे राज्य और केंद्रीय सरकार की चक्की में पिस रही हैं।