पाकिस्तानी गोलाबारी के खौफ ने सीमांत ग्रामीणों के जेहन में स्थायी घर बना लिया है। आजादी के 67 बाद भी पाक गोलाबारी उन्हें अक्सर शरणार्थी कैंपों तक धकेल देती है। घर से बेघर होकर कैंपों में दिन गुजारना इन ग्रामीणों की नियति बन गई है। भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर इस साल दूसरी बार सीमांत ग्रामीण शरणार्थी कैंपों तक पहुंचे हैं।
सांबा में अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर इस साल अगस्त में और पिछले साल भी ग्रामीणों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। इस बार भी उसी स्थिति से रूबरू हैं। दहशत में जी रहे ग्रामीण अब गांव लौटना नहीं चाहते। महिलाओं ने करवा चौथ कैंपों में मनाया और अब दीपावली की चमक पर भी पाकिस्तानी ग्रहण के आसार बढ़ गए हैं।
आरएस पुरा के हायर सेकेंडरी स्कूल और आईटीआई स्थित कैंपों में शरण लिए ग्रामीणों का सरकार से भरोसा उठने लगा है। हर बार दर बदर होने पर उन्हें आश्वासन मिलता है, लेकिन, सुरक्षित इलाकों में पांच मरले का प्लाट अब भी सपना ही है।
पाकिस्तानी चुप्पी में भी षडयंत्र
दो माह पहले पाकिस्तानी गोलाबारी के बाद रियासत सरकार ने सीमांत इलाके में हर गांव में बंकर बनाने का ऐलान किया था, लेकिन, घोषणा के धरातल पर उतरने से पहले ही पाकिस्तान ने फिर गोलाबारी तेज कर दी। ग्रामीणों को फिर शरणार्थी कैंपों में आना पड़ा। पाक गोलाबारी के बाद सीमांत ग्रामीणों के लिए जम्मू जिले में बने सभी 16 शरणार्थी कैंपों में एक जैसी स्थिति है।
उधर, कठुआ के कैंपों में शरण लिए 57 गांवों के दस हजार से ज्यादा लोग पाकिस्तानी चुप्पी में भी षडयंत्र महसूस करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया है, लेकिन, पाक दबाव में गोलाबारी का नया मोर्चा खोलने के लिए बदनाम रहा है। अरनिया और पुंछ में पाक गोले फिर से बरसने लगे हैं।
नतीजतन अंतर्राष्ट्रीय सीमा के ग्रामीणों में भी दहशत बढ़ गई है। इस बार पाक के गोलों ने ज्यादा कहर बरपाया है। कठुआ और सांबा के 40 हजार से अधिक ग्रामीण इस गोलाबारी की चपेट में आए हैं। कठुआ में 61 सरकारी भवनों में शरणार्थी कैंप बनाए गए हैं। प्रशासन ने सीमा से सटे पांच किलोमीटर के दायरे वाले 12 और गांवों को खाली करा दिया है। इसके लिए 16 अतिरिक्त कैंप बनाए गए हैं।
कब कितनी बार हुआ सीजफायर का उल्लंघन
2010- 44
2011- 51
2012- 93
2013- 251
2014- अब तक 150 से अधिक बार