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Bhim Singh Passed Away: प्रो. भीम सिंह की सद्दाम हुसैन, गद्दाफी से थी दोस्ती, 200 से ज्यादा कैदियों को दी थी मुफ्त मदद

Wed, 01 Jun 2022 01:34 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

प्रो. भीम सिंह ने विश्व के कई देशों की यात्रा की। इस दौरान उनकी फलस्तीनी नेता यासिर अराफात, क्यूबा के क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो, इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन, लीबिया के मुअम्मार गद्दाफी से मित्रता हुई। 
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भीम सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सियासत के साथ प्रो. भीम सिंह बेहद पेशेवर और कानून के माहिर वकील भी थे। विश्व भ्रमण के दौरान उनकी फलस्तीनी नेता यासिर अराफात, क्यूबा के क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो, इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन, लीबिया के मुअम्मार गद्दाफी से मित्रता रही। वकील के तौर पर उन्होंने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, पीओजेके के ऐसे 200 से अधिक कैदियों को कानूनी मदद दी, जो दशकों से देश की विभिन्न जेलों में बंद थे।

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उन्होंने जनहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को अदालत के संज्ञान में लाकर लोगों को राहत दिलाई। वर्ष 1985 में तत्कालीन राज्य सरकार ने उन्हें विधानसभा से निलंबित कर जेल भेज दिया था। उन्होंने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर फैसला देकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था।

अगस्त 1941 में हुआ था जन्म
इसके बाद उन्होंने भतीजे हर्ष देव सिंह को यह स्थान दिया। उन्होंने पिछले साल एक बार फिर से सक्रिय नेतृत्व में वापसी की थी, जब उन्हें पैंथर्स पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था, तब पार्टी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में चार सीटें जीतकर पीडीपी के साथ सरकार बनाई।
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मोटरसाइकिल पर 130 देशों की यात्रा की
प्रो. भीम ने मोटरसाइकिल पर 130 देशों की यात्रा और 150 देशों का भ्रमण किया था। बाइक पर विश्व यात्रा करने पर पुस्तक पीस मिशन अराउंड द वर्ल्ड ऑन मोटरसाइकिल भी लिखी, जिसका विमोचन डॉ. कर्ण सिंह ने किया था। उनकी पुस्तक अनबिलिवेबल-दिल्ली टू इस्लामाबाद का विमोचन तत्कालीन उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया था।
 
1988 में लड़ा लोकसभा का चुनाव
प्रो. भीम सिंह ने 1988 में अपना उधमपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। इसमें वह हार गए थे। चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए उन्होंने चुनाव आयोग के खिलाफ भूख हड़ताल की। चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ उनकी समीक्षा याचिका के जवाब में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने चार साल बाद उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन तब तक संसद का सत्र पहले ही भंग हो चुका था।

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