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फौलादी हौसलों के आगे झुक गया माउंट एवरेस्ट

Fri, 24 Jun 2016 11:40 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/कठुआ
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एवरेस्ट पर त‌िरंगे के साथ बलकार सिंह - फोटो : Amar Ujala
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दृढ़ निश्चय, फौलादी हौसले और करोड़ों लोगों की दुआएं लिए बलकार सिंह और उनकी टीम एवरेस्ट पर चढ़ी, तो एवरेस्ट की ऊंचाई भी कम पड़ गई। 17 साल से माउंटेनियरिंग में कई पर्वतों की ऊंचाइयां मापने वाले बलकार का एवरेस्ट पर चढ़ने का सपना पूरा हुआ। जान का जोखिम और दुर्गम इलाकों के साथ मौसम की विकट परिस्थितियों को पार करते हुए बलकार ने एवरेस्ट पर चढ़ाई की। दो महीने की अथक मेहनत रंग लाई तो देश का तिरंगा भी एवरेस्ट पर शान से लहराया। गगनचुंबी एवरेस्ट की चोटी पर बादलों का डेरा देख बलकार को स्वर्ग जैसा लगा। 27 मई 2016 की सुबह लगभग ग्यारह बजे तक बलकार सिंह और उनकी टीम ने तिरंगे को एवरेस्ट की चोटी पर फहरा दिया। अमर उजाला के संवाददाता एस खजूरिया की एवरेस्ट विजेता बलकार सिंह से हुई बातचीत के मुख्य अंश...
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चॉकलेट, मैगी, एनर्जी ड्रिंक से काटे दिन 
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट की चढ़ाई कठिन तो थी ही, साथ ही परिस्थितियों में खुद को ढाल पाना भी टीम के लिए मुश्किल था। बेस कैंप पर सात दिन बिताने के दौरान सभी सुविधाएं मिलीं, लेकिन कैंप वन, कैंप टू और कैंप थ्री की कठिनाइयां ज्यादा मुश्किल थीं। आखिरी चढ़ाई में तीन दिन पानी का ही सहारा लिया। आगे बढ़ने पर चॉकलेट, एनर्जी ड्रिंक और मैगी का सहारा लेना पड़ा। पहली चढ़ाई बेस कैंप से कैंप वन तक की गई। पहली बार टीम तेरह घंटे में कैंप वन तक पहुंची। इसके बाद बेस कैंप से दूसरी चढ़ाई कैंप टू तक की गई। तीसरी बार कैंप थ्री तक जाकर टीम बेस कैंप तक लौटी, जिसमें कई सप्ताह बीत गए। आखिरी चढ़ाई सीधे एवरेस्ट की ओर की गई, जिसमें लगभग एक सप्ताह का समय लगा। 21 मई को बेस कैंप से रवाना टीम ने सफलता हासिल की। 

रात के समय चढ़ाई करने की बनाई रणनीति 
उनकी टीम ने एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए रात के समय तय करने की रणनीति बनाई। टीम को दो हिस्सों में बांटकर कैडेट्स को आगे बढ़ाने का फैसला लिया। सुबह नौ बजे वायरलेस से बेस कैंप में संपर्क कर जानकारी दी थी कि कुछ ही घंटों में वे एवरेस्ट फतह करेंगे। रात के समय चढ़ाई करने का एक मकसद सूरज की झुलसा देने वाली किरणों और तेज हवाओं से बचना था। 
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टीम को यकीन ही नहीं हुआ 
एवरेस्ट फतह कर लेने पर भी टीम को यकीन नहीं हुआ कि उन्होंने अपना  मुकाम हासिल कर लिया है। इसके बाद वायरलेस पर जैसे ही मैसेज फ्लैश हुआ, बेस कैंप पर भारतीय टीम की खुशी एवरेस्ट की चोटी पर महसूस की गई। एवरेस्ट की चोटी से दिखने वाला नजारा अद्भुत था। मौसम के अच्छे मिजाज के चलते जहां तक नजर जाती थी, सिर्फ बादलों का डेरा ही दिख्ता, मानो स्वर्ग में पहुंच गए हों।

तीन साल पहले खो दिए तीन साथी 
दार्जिलिंग के देवटिब्बा पर्वत पर बलकार सिंह उनकी टीम और एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले एनसीसी कैडेट्स ने मार्च, 2016 में अभ्यास किया। बलकार ने बताया कि साल 2012 में देवटिब्बा पर्वत की चढ़ाई के दौरान हिमस्खलन में उनसे कुछ ही फुट दूरी पर तीन साथी लापता हो गए थे, जिनका आज तक कुछ पता नहीं चला। माउंटेनियरिंग में जान का जोखिम तो है लेकिन किसी ऊंचे पर्वत को चढ़ने के बाद ऐसा अहसास होता है जैसे जीवन में कोई बड़ा मुकाम हासिल कर लिया हो। इसलिए इस पैशन को वह आगे भी जारी रखेंगे। एवरेस्ट से पहले वह अविगामन (गढ़वाल), सासर कांगड़ी (लेह), केदार डूम (गढ़वाल) आदि पहाड़ों की चोटियों को भी नाप चुके हैं। 
 
और भी ऊंचा होता एवरेस्ट तो जरूर चढ़ते
एवरेस्ट पर किसी भी माउंटेनियर का चढ़ना एक बड़ी बात है, चूंकि यह काफी मुश्किल काम है, लेकिन इस बार उन्हें जो टास्क मिला, वह और भी कठिन था। अपने साथ ग्लर्स एनसीसी कैडेट्स को भी एवरेस्ट की चढ़ाई करवानी थी। इसी वजह से कई बार देरी भी होती थी। दुर्गम परिस्थितियों में भी खुद के हौसले को बनाए रखना और साथियों का हौसला बढ़ाने से अंतिम में एवरेस्ट की ऊंचाई को छू लिया।
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