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Baba Chamliyal Mela: न पाकिस्तान से चादर आई और न ही शक्कर-शरबत गई, सवा लाख ने नवाया शीश, बीएसएफ ने सुबह मजार पर चढ़ाई चादर

Thu, 23 Jun 2022 05:18 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित बाबा चमलियाल का मेला आज आयोजित हुआ। इस बार पाकिस्तान की तरफ से चादर नहीं पहुंची और न ही भारत की तरफ से पाकिस्तान को शरबत और शक्कर भेजी गई।
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Baba Chamliyal Mela 2022 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोरोना काल के बाद भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जीरो लाइन के करीब वीरवार को आयोजित ऐतिहासिक बाबा चमलियाल मेले में आस्था का सैलाब उमड़ा। लगभग सवा लाख श्रद्धालुओं ने बाबा दलीप सिंह मन्हास की मजार पर माथा टेका। हालांकि, इस बार भी पाकिस्तान की ओर से बाबा के दरगाह पर न तो चादर आई और न ही भारत से सीमा पार शक्कर और शर्बत भेजी गई। 2018 से ही पाकिस्तानी गोलाबारी के बाद से यह सिलसिला रुका हुआ है। 

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सुबह सवा चार बजे ही बीएसएफ की ओर से बाबा के मजार पर चादर चढ़ाई गई। इसके बाद श्रद्धालुओं का तांता लग गया। मजार पर शीश नवाने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश व दिल्ली के साथ ही जम्मू-कश्मीर के लोग भी पहुंचे। प्रशासनिक अधिकारी से लेकर विभिन्न पार्टियों के नेताओं ने मजार पर हाजिरी दी। देर शाम तक श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता रहा। वहीं, बाबा के मजार के ठीक सामने पाकिस्तान की सैंदावाली गांव में ढोल की थाप इस पार भी सुनाई दे रही थी। गांव के लोग पिछले कुछ दिनों से लगातार ढोल बजा रहे हैं। 

13 जून 2018 को चमलियाल की अग्रिम पोस्ट पर पाक रेजरों ने बीएसएफ के गश्ती दल पर गोलीबारी की थी, जिसमें एक अधिकारी सहित चार जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद से पाकिस्तान के साथ मेले को लेकर कोई संपर्क नहीं किया गया। बीएसएफ के डीआईजी सुरजीत सिंह के अनुसार इस बारे में उच्च अधिकारियों द्वारा सरकार के साथ बात कर निर्णय लिया जाता है। वहीं, उपायुक्त अनुराधा गुप्ता ने कहा कि पाकिस्तानी रेजरों के साथ संपर्क करने के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।

यह पहली बार नहीं है जब चादर नहीं आई। इससे पहले भी जब कभी भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का माहौल बना, उस समय पाकिस्तान के श्रद्धालुओं को शक्कर और शर्बत नहीं दी गई। न ही बाबा की मजार के लिए चादर आई। मेले में भारी संख्या में श्रद्धालुओं के आने के चलते अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए थे। बीएसएफ की ओर से गश्त तेज करने के साथ ही जवानों को पूरी तरह सतर्क रखा गया था ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। 
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क्या है मेले का इतिहास

जानकारों के मुताबिक की दो सौ वर्ष पूर्व दग गांव में बाबा दलीप सिंह मन्हास रहा करते थे। वह चंबल रोग का उपचार करते थे। कहा जाता है कि उनकी मौत के बाद जब लोग चंबल रोग का शिकार होने लगे तो एक दिन बाबा ने अपने शिष्य को सपने में बताया कि उनके स्थान से मिट्टी और कुएं के पानी के लेप करने से चंबल का रोग ठीक हो जाएगा।

यह विधि अपनाते ही उक्त चर्म रोग से पीड़ित लोगों को लाभ मिलने लगा। यह भी कहा जाता है कि भारत-पाक के बंटवारे से पहले से वहां के श्रद्धालु बाबा की मजार पर चादर चढ़ाने आया करते थे। और शक्कर-शरबत ले जाते थे। बाद में हालात बिगड़ने पर पाक के श्रद्धालु केवल चादर ही भेजते हैं, जिसे भारतीय सुरक्षा बल के अधिकारी बाबा की मजार पर चढ़ाते हैं।
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