फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कश्मीर: क्या यह चुनाव का सही वक़्त है?

विज्ञापन
विज्ञापन
तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए और नेशनल कांफ्रेंस के कड़े विरोध को दरकिनार करके भारतीय चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए पांच चरणों के चुनावों की तारीख़ का ऐलान कर दिया।
विज्ञापन


सितंबर में आई बाढ़ ने जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई और राजधानी श्रीनगर को तो लगभग बर्बाद कर दिया। इसीलिए चुनाव करवाना बड़ी बहस का मुद्दा बनता जा रहा था। जम्मू-कश्मीर विधानसभा का छह साल का कार्यकाल 19 जनवरी को ख़त्म हो रहा है।

बहस इस बात पर थी कि क्या ऐसी स्थिति में चुनाव करवाना सही होगा जब हज़ारों बाढ़ पीड़ितों के पास अब भी रहने का ठिकाना नहीं है।

नेशनल कॉंफ्रेंस चुनाव करवाने के ख़िलाफ

सिर्फ़ सत्तारूढ़ नेशनल कॉंफ्रेंस ही नहीं बल्कि कई नागरिक संगठन भी इस स्थिति में चुनाव करवाने के ख‌िलाफ थे। नेशनल कांफ्रेस का कहना था कि चुनाव को फिलहाल टाल देना चाहिए ताकि राहत और पुनर्वास कार्यों पर ध्यान दिया जा सके।

हालांकि नेशनल कांफ्रेस की सहयोगी कांग्रेस समेत अन्य पार्टियां वक्त पर चुनाव करवाने के हक़ में हैं। अब चूंकि चुनाव आयोग ने 25 नवंबर से 20 दिसंबर तक पांच चरणों में चुनाव करवाने की घोषणा कर दी है इसलिए बहस अब चुनाव संचालन और इसमें भाग लेने में बदल गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने संकेत दिए हैं कि चुनाव में हिस्सेदारी कम हो सकती है और कुछ लोगों का भी यही मानना है।

हालांकि अन्य राजनीतिक दलों का मानना है कि बाढ़ और बाढ़ के बाद सरकार के 'असंतोषजनक' प्रदर्शन के चलते लोग बदलाव के लिए बड़ी संख्या में मतदान कर सकते हैं।
विज्ञापन

अलगाववादी भी उतरे चुनावों के व‌िरोध में

चुनाव का विरोध करने वाले अलगाववादी राजनीतिक दल चुनावों के बहिष्कार के अपने अभियान को गति दे सकते हैं। राहत और पुनर्वास कार्यों में देरी से लोगों में काफ़ी रोष है और अलगाववादी दल इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और कोशिश करेंगे की कम से कम लोग मतदान करने निकलें।

आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रपति शासन की मांग की जा रही है क्योंकि ज़्यादातर लोगों का मौजूदा व्यवस्था से विश्वास उठ गया है और उन्हें इस शासन के तहत राहत और पुनर्वास कार्यों पर भरोसा नहीं है। कश्मीर पर नज़र रखने वालों को लगता है कि यह समय चुनाव के लिए बहुत अच्छा नहीं है क्योंकि इससे पहले ही त्रस्त जनता पर और बोझ पड़ेगा।

लेकिन वर्तमान सरकार की विफलता को देखते हुए इस स्थिति में चुनाव करवाना एक 'अनिवार्य बोझ' बन गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ज़्यादा 'लोगों के अनुकूल' सरकार आ सके जो पुनर्वास प्रक्रिया को ज़्यादा बेहतर ढंग से और पारदर्शी ढंग से निपटा सके।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें