अनुच्छेद 370 व 35ए हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में बीते पांच साल में कई सकारात्मक बदलाव सामने आए। सड़क, बिजली, पानी सुविधा में बढ़ोतरी के साथ ही माहौल बदला। आम जनता की मानसिकता बदली। अब जगह-जगह तिरंगे शान से फहरने लगा। पाकिस्तान की सीमा तक तिरंगा फहर रहा है। लोग राष्ट्रगान गाने लगे हैं। स्कूलों में प्रार्थनाएं होने लगी हैं। अब लोगों को तिरंगे से कोई परहेज नहीं रह गया है। कश्मीर में हिंदी का चलन बढ़ा है। नाइट लाइफ आबाद है। सीमा पार से बंद की कॉल न आने से कारोबारी प्रतिष्ठान भी रोजाना खुल रहे हैं। पर्यटक बढ़े हैं। इससे अर्थव्यवस्था में सुधार आया है। पिछले पांच साल में नए जम्मू कश्मीर ने आकार लिया है।
अनुच्छेद 370 व 35ए से आजादी के पांच सालों में जम्मू-कश्मीर में जो सबसे बड़ा बदलाव आया वह लोगों की मानसिकता में आया आमूलचूल परिवर्तन है। अलगाववादी सोच हाशिये पर चली गई है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण गत लोकसभा चुनाव में सामने आया, जब अलगाववाद की जनक माने जाने वाली प्रतिबंधित जमात-ए- इस्लामी और हुर्रियत से जुड़े लोगों ने भी भारतीय संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए मतदान में हिस्सा लिया। अब तो जमात विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। यह भी संभावना जताई जा रही है कि यदि विधानसभा के चुनाव घोषित होते हैं तो कई अलगाववादी भी सामने आ सकते हैं।
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उत्तर कश्मीर, दक्षिण कश्मीर व मध्य कश्मीर सभी जगह जमात से जुड़े लोग सक्रिय रहे हैं। अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में कहीं भी चुनाव बहिष्कार का नारा नहीं लगा। किसी भी बूथ पर शून्य वोटिंग नहीं हुई, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में अकेले दक्षिण कश्मीर अनंतनाग सीट पर 100 से अधिक बूथों पर शून्य मतदान हुआ था।
अनंतनाग राजोरी सीट पर कुलगाम में जमात के फलाह-ए-आम ट्रस्ट के सहायक निदेशक सैयार अहमद रेशी, अलगाववादी मुख्तार वाजा, आतंकी जुनैद रेशी के पिता मुश्ताक अहमद रेशी ने मतदान किया। बारामुला से अलगाववादी नेता नईम खान के भाई नजीर खान चुनाव मैदान में डटे।
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बारामुला में लश्कर-ए-ताइबा के आतंकी उमर के भाई रउफ अहमद और टीआरएफ कमांडर बिलाल के परिवारवालों ने भी वोट डाले। पुलवामा में जमात ए इस्लामी के पूर्व अमीर (प्रमुख) गुलाम कादिर ने भी लोकतंत्र में आस्था जताते हुए मतदान किया। श्रीनगर, बारामुला और अनंतनाग-राजोरी सीट पर 50.86 फीसदी मतदान ने पिछले कई सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
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जमात व अलगाववादी विस चुनाव लड़ने की तैयारी में
बताते हैं कि घाटी के बदले माहौल में जमात के साथ ही कई अलगाववादी भी मुख्य धारा में शामिल होकर चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं। अलगाववादी गठजोड़ की संभावना भी तलाशी जा रही है। हालांकि, यह अंदर खाते ही है। कई अलगाववादियों ने तो जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी की सदस्यता भी हासिल की है।
जमात-ए-इस्लामी अब विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इसके तहत संगठन के संविधान में बदलाव की तैयारी की जा रही है। जमात के पूर्व अमीर डॉ. अब्दुल हमीद फैयाज का कहना है कि संगठन 1943 से प्रदेश में काम कर रही है। संविधान में बदलाव कर लोकतंत्र के पर्व में शामिल होने पर विचार किया जा रहा है।
अलगाववादियों को लेकर सतर्कता जरूरी
हालांकि, बारामुला सीट पर इंजीनियर रशीद की लोकसभा चुनाव में जीत को लोग यह मान रहे हैं कि इससे अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा मिलेगा। पिछले पांच साल में सरकार ने जिस पर काबू पाया था वह विचारधारा फिर फन उठा सकती है। नेकां उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला भी कई मौकों पर इस ओर इशारा कर चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. हरिओम का मानना है कि सरकार ने पिछले पांच साल में अलगाववाद पर काफी हद तक अंकुश पाया है, लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना है। मुख्यधारा में यदि यह शामिल होते हैं तो यह देखना होगा कि कहीं दोबारा इस विचारधारा को लोगों पर न थोपें। इसलिए अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी।
कुछ बड़े बदलाव
10 फीसदी आर्थिक रूप से कमजोर तबके को आरक्षण
15 नई जातियों को ओबीसी आरक्षण, कोटा चार से बढ़ाकर आठ फीसदी
10 फीसदी आरक्षण पहाड़ी, पादरी, कोली एवं गद्दा ब्राह्णाण को
33636 पीओजेके (1947) व छंब (1965 व 1971) विस्थापितों को साढ़े पांच लाख रुपये एकमुश्त
3237 पश्चिम पाकिस्तान शरणार्थियों को साढ़े पांच लाख एकमुश्त, डोमिसाइल सुविधा, जमीन का मालिकाना हक, सरकारी नौकरियों के लिए खुले द्वार
47129 कश्मीरी विस्थापितों को डोमिसाइल नियम का लाभ, नौकरी, शिक्षा व अन्य लाभ उठाने के योग्य
3.50 लाख अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) पर रहने वाले परिवारों को आरक्षण का लाभ
62.64 लाख लोगों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी, पश्चिमी पाकिस्तान शरणार्थियों, वाल्मीकि, गोरखा, सफाई कर्मियों व प्रदेश से बाहर शादी करने वाली महिलाओं को पहली बार मिला अधिकार