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लद्दाख : वोकल फॉर लोकल... सेना से मिली सहायता तो रणभूमि में खिल उठी खुबानी

Sat, 01 Jan 2022 01:17 AM IST
दुष्यंत शर्मा एजेंसी, तुर्तुक (लद्दाख)

सार

1971 में पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त कराए लद्दाख के गांव में सेना की मदद से बढ़ रही खुबानी उत्पादकों की आय।
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बदल रहे हैं हालात... - फोटो : ani
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ मंत्र पर अमल करते हुए लद्दाख में सेना ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास तुर्तुक गांव में खुबानी उत्पादकों की मदद शुरू की तो कुछ ही दिनों में खेती से उनकी आय में भारी इजाफा हुआ है। इस गांव को भारतीय सेना ने 1971 में पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त कराया था। यहां खुबानी की हलमां और राखैकारपो किस्मों की उपज होती है। सेना ग्रामीणों की उपज को पैक और बेचने में मदद कर रही है।

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सेना के एक अधिकारी ने बताया कि खुबानी की पैकेजिंग की सुविधा से देश की सीमा के आखिरी छोर पर मौजूद गांव के स्थानीय लोगों में उद्यमशीलता की भावना आई है। इसके अलावा इस पहल से महिला सशक्तीकरण में भी मदद और रोजगार सृजन भी हुआ है। इस पहल की कामयाबी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब लेह-तुर्तुक में पर्यटकों को खुबानी उत्पाद जैसे जैम, तेल और डिब्बाबंद खुबानी बेचे जा रहे हैं, इसके अलावा सैनिक भी इनका इस्तेमाल करते हैं। अग्रिम मोर्चेे के दौरे के समय सेना प्रमुख ने भी कमांडरों को सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के साथ जुड़ने और उन्हें सशक्त बनाने के निर्देश दिए थे।

15 जनवरी को दिल्ली दिखेगी कामयाबी की झलक
पैकेजिंग प्लांट लगने से तुर्तुक की सूक्ष्म अर्थव्यवस्था जीवंत और सक्रिय हो गई है। स्थानीय लोग सेना की इस पहल के बाद सेना को अपने गांव और परिवार का हिस्सा मानने लगे हैं। इस पहल की कामयाबी को 15 जनवरी को दिल्ली में आयोजित होने वाले सेना दिवस कार्यक्रम के दौरान प्रदर्शित करने की भी योजना है।
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पहले बर्बाद हो रही थी फसल
बागवानी विभाग की तरफ से 2017 में जारी आंकड़ों के मुताबिक खुबानी की कुल उपज में से करीब 15 हजार मीट्रिक टन पैदावार सुविधाओं की कमी के कारण बर्बाद हो जाती है। सेना के अधिकारियों ने बताया कि कुल 30 लाख रुपये की लागत से बनी परियोजना का 100 फीसदी वित्तपोषण डिस्किट स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा ने सॉफ्ट लोन के जरिये किया है। गाजियाबाद स्थित बजाज प्रोसेसपैक लिमिटेड के माध्यम से प्रसंस्करण और पैकेजिंग का समन्वय किया गया और डिब्बाबंद खुबानी के सबसे कड़े प्रयोगशाला परीक्षणों के बाद एफएसएसएआई की मंजूरी ली गई।

15 हजार डिब्बों का उत्पादन हुआ
परियोजना का विचार आने के तीन महीनों के भीतर भारतीय सेना की त्याक्षी बटालियन ने जुलाई 2021 के अंतिम सप्ताह में डिब्बाबंद खुबानी का उत्पादन शुरू कर दिया था। विभिन्न गांवों के किसानों से रोजाना सुबह फल एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद इनको छांटा, धोया और काटा जाता है। आखिर में चाशनी के साथ पैक किया जाता है। अब तक, 30 लाख रुपये से अधिक के कुल वाणिज्यिक मूल्य के लगभग पंद्रह हजार डिब्बों का उत्पादन किया जा चुका है। इस पहल से नब्बे से अधिक स्थानीय किसान और पंद्रह अन्य लोग लाभान्वित हुए हैं।

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