आत्महत्या के लिए उकसाने वाले एक मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए जमानत के फैसले को खारिज करने की मांग को हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। मृतक के पिता ने याचिका दायर कर फैसले को रद करने की मांग की थी। केस के अनुसार मोहन सिंह सलाथिया ने 14 सितंबर 2014 को आत्महत्या कर ली थी। दोमाना थाने ने इस मामले में पहले आरपीसी की धारा 174 के तहत कार्यवाही करने के बाद 306 के तहत तीन लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर जांच शुरू की थी। चार अक्तूबर 2014 को पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
उसी दिन सभी आरोपियों ने न्यायिक मजिस्ट्रेट जम्मू की अदालत में जमानत आवेदन जमा करवाया और मजिस्ट्रेट ने उनके आवेदन पर गौर करने के बाद अंतरिम जमानत दे दी। पुलिस की ओर से जमानत का विरोध किया गया और घटना की विस्तृत जानकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष रखी। 20 अक्तूबर को मजिस्ट्रेट ने कुछ निर्देशों के साथ अंतरिम जमानत को जमानत में बदल दिया। साथ ही कहा कि आरोपी किसी भी तरह साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों पर दबाव नहीं बनाएंगे। मजिस्ट्रेट के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
जस्टिस जनक राज कोतवाल ने वकीलों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि आरोपियों को जिस आधार पर जमानत दी गई, उसके संबंध में जमानत रद्द करने का कोई ग्राउंड कोर्ट में नहीं रखा गया। एक प्रतिवादी न्यायिक स्टाफ होने के बावजूद जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। यह समझाए बिना वह अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए जमानत खारिज करवाने के लिए ग्राउंड तैयार ही नहीं किया। इसलिए जमानत खारिज करने का कोई आधार नहीं बनता। तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए अपील को खारिज किया जाता है। जेएनएफ