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...और आंखें वीरों से करने लगीं बातें

Wed, 25 Mar 2015 02:01 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
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भारत को आजाद कराने की छटपटाहट। स्वाभिमान के साथ जीने का सपना। अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की हर मुमकिन तैयारी। कुछ इन्हीं दिलेरी के साथ शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की क्रांति गाथा को शक्तिनगर में मंच पर जीवंत किया नटमंच के कलाकारों ने।
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नाटक मेें अंग्रेज सरकार जहां भयभीत होती है, वहीं क्रांतिकारियों का हौसला जेल की यातनाओं के बाद भी नहीं टूटता है। तरुण शर्मा निर्देशित नाटक शहीदी की शुरूआत में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव भारत को आजाद कराने का संकल्प लेते हैं। फिर योजनाबद्ध तरीके से अंग्रेज सरकार से लड़ाई लड़ने की तैयारी करते हैं।

अंग्रेज अफसर मारा जाता है। इस पर फरमान जारी होने लगता है। कुछ समय बाद तीनों क्रांतिकारी जेल में डाल दिए जाते हैं। यहां उन्हें असहनीय यातनाएं दी जाती हैं। हालांकि जब भी उन्हें होश आता है, तो उनके मुंह से इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय और अंग्रेजों भारत छोड़ो निकलता है।
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अंग्रेज सरकार उनकी फांसी की तैयारी करती है। फिर एक बार को अजीब सन्नाटा पसर जाता है। जल्लाद के पहुंचते ही दर्शकों में बेचैनी दिखने लगती है। ऐसा लगता जैसे उदास चेहरे, अशांत मन और अपलक उन्हें निहारती आंखें उनसे संवाद करते हों। नाटक में रंजीत सिंह, मोहित, ऋषभ, निखिल ने भूमिका निभाई।
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