वर्ष 2017 से पहले राकेश कुमार प्लंबर थे। उन्होंने कभी सपने में भी तीरंदाज बनने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन इसी साल उनकी जिंदगी में ऐसा भूचाल आया कि जीवन ही दांव पर लग गया। सड़क दुर्घटना में उनके सारे साथियों का निधन हो गया। राकेश बच गए, लेकिन ये जिंदगी किसी बोझ से कम नहीं थी। तीन बार आत्महत्या का प्रयास किया, लेकिन जिंदगी को कुछ और ही मंजूर था।
एक मेडिकल सेंटर में राकेश की मुलाकात कोच कुलदीप वेदवान से हुई, यहीं से उनकी जिंदगी बदल गई। एशियाई पैरा तीरंदाजी में तीन स्वर्ण पदक जीतकर लौटे राकेश अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में खुलासा करते हैं कि 27 जून, 2017 में उन्होंने माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड अकादमी में तीरंदाजी शुरू की थी और अगले ही साल 30 जून को उन्होंने देश के लिए स्वर्ण अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत लिया।
व्हील चेयर को ही पैर मानते हैं राकेश
सड़क दुर्घटना के बाद राकेश के पैर काम नहीं करते हैं। व्हील चेयर ही अब उनका सहारा है, लेकिन राकेश इस व्हील चेयर को ही अपने पैर मानते हैं। राकेश कहते हैं कि उनके लिए अब सबसे बड़ा गौरव का क्षण वह होता है जब आप स्वर्ण पदक जीतते हो और देश का झंडा तिरंगा ऊपर उठाया जाता है। राष्ट्रगान की धुन सारे कष्टों को दूर कर देती है।
ट्रस्ट ने 200 से ज्यादा दिलाए पदक
राकेश माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तारीफ करते नहीं थकते हैं। वह कहते हैं कि यह देश का एकमात्र ऐसा मंदिर का ट्रस्ट है जो खेलों को बढ़ावा दे रहा है। यह सिलसिला 2017 से चलता आ रहा है। उसके बाद से ट्रस्ट के खिलाडिय़ों ने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर 200 से अधिक पदक जीत लिए हैं। राकेश अपनी और ट्रस्ट के तीरंदाजों की सफलता का श्रेय कोच कुलदीप वेदवान को देते हैं। वह बताते हैं कि कोच न तो कभी छुट्टी लेते हैं और न हमें लेने देते हैं। यही कारण है कि तीरंदाजों का प्रदर्शन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बढ़ता जा रहा है। शीतल देवी का इसका जीता-जागता उदाहरण हैं।