जम्मू कश्मीर में लोहड़ी का पर्व मनाने की तैयारी शुरू हो गई है। लोहड़ी उत्तर भारत के अधिकांश स्थानों में मनाया जाने वाला पर्व है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह शरद ऋतु के अंत में मनाया जाता है। इस दिन के बाद से दिन बड़े होने लगते हैं। जम्मू, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा में इस त्यौहार को बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
डुग्गर प्रदेश में इसको मनाने की विशेष परम्परा है। जम्मू विश्वविद्यालय के डोगरी विभाग की अध्यक्षा प्रो. सुषमा शर्मा ने डुग्गर की लोहड़ी का महत्व बताया। उन्होंने डुग्गर प्रदेश में पहले की लोहड़ी के बारे में कहा कि तब बच्चे दो महीना पहले ही तैयारियां करने लगते थे।
लोहड़ी आने पर घर-घर जाकर लोहड़ी मांगना, छज्जों को सजाना, हिरण बनकर प्रस्तुति देना, तबले, ढोलकी आदि बजाकर बड़े चाव से लोहड़ी पर्व मनाते थे। यह प्रदेश में लगभग 50 वर्ष पूर्व में अपनाई जाती थी। इस दिन बच्चों को खाली हाथ लौटाना सही नहीं माना जाता।
बच्चों को लोग इस दिन मूंगफली, धान, गजक, पैसे आदि देकर लोहड़ी सुनते हैं। आज भी इस पर्व को ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ हद तक मनाया जाता है। डुग्गर प्रदेश में पर्व मनाने की रीति: नवविवाहितों को इस पर्व पर विशेष प्रकार के मेवे, मुंगफली, नारियल आदि से बने हार से माला बनाकर पहनाया जाता है।
घर में जन्में बच्चों के लिए भी ननिहाल वाले अनेक प्रकार के मेवों से बने हार उपहार रूप में देते हैं। इसके साथ ही दादा-दादी भी उपहार देकर खुशियां मनाते हैं। आज के समय में विशेष रूप से लड़की के जन्म लेने पर भी त्यौहार को उत्साहपूर्वक मनाते हैं।
प्रो. सुषमा शर्मा ने कहा कि पहले के समय में इस दिन अपने आसपास मोहल्ले, घर-रिशतेदारों, मित्रों आदि में प्रदेश में बनने वाले बबरु, पठोरे, चिड़वे, पतासे, किन्नु आदि बांटते की परम्परा थी। इस पर्व में लोग कई वर्षों से दूल्लहा भट्टी नामक व्यक्ति के चरित्र से जोड़ते हैं।
इकट्ठे होकर पर्व मनाने की परम्परा: जहां आधुनिक युग में लोग अपने निजी कार्यों में व्यस्त रहते हैं। वही इस पर्व में लोग अपने घरों में इकट्ठे होकर अग्नि जलाकर आपस में खुशियां बांटते हैं। घर के सभी सदस्य अग्नि को अर्घ्य देकर सुख-समृद्घि की कामना करते हैं।