हर तरफ एक जैसी शिकायतें...मोदी फैक्टर का दिख रहा असर
नगरोटा से जानीपुर होते हुए भलवाल तक पहुंचने तक कई लोग मिले। चेहरे तो बदले पर शिकायतें एक जैसी मिलीं। टूटे जूते बना रहे रतनाल के पास हम पहुंचे। वे कील पर हथौड़ी से ऐसा वार कर रहे थे मानो सारा गुस्सा उसी पर निकल रहा हो।
सुविधाओं को लेकर सवाल पर कहते हैं, तीन दिन में एक बार पानी आता है, इसी से आप जान लीजिए। घरोटा के दर्शन कुमार सवाल करते ही गड्ढों वाली सड़क की ओर इशारा कर देते हैं। हम बर्न पहुंचे तो छोटी-छोटी दुकानें खोलकर बैठे पूरन सिंह, देवराज और प्रताप कहते हैं कि भाजपा के नेताओं से नाराजगी है पर पीएम मोदी के नाम पर लोग भाजपा को ही जिताएंगे। यह सीट भाजपा की है और उसी की रहेगी। पूरन सिंह कहते हैं कि भाजपा के नेता बोलते तक नहीं, जलसा होता है तो आ जाते हैं।
खुद का वजूद तलाशती महिलाएं
कटर बटाल की ओर आगे बढ़ते वक्त बच्चों को स्कूल लेने जा रहीं रीता देवी और ऊषा देवी मिलती हैं। हमने हाल-चाल पूछा तो मुस्कुराने लगीं। सियासी सवाल पर दोनों बिना किसी लाग लपेट के कहती हैं-हमें कहां कुछ बोलने दिया जाता है। हम लोग मैट्रिक पास हैं।
समय के साथ हम भी आगे बढ़ना चाहते थे, कुछ सीखना चाहते थे पर घर छोड़कर जा नहीं सकते। हमने कौशल विकास के बारे में सुना है पर हमारे यहां दूर-दूर तक कोई सेंटर नहीं है। हमें कोई जानकारी नहीं तो कैसे कोई काम शुरू करें? पास में ही बच्चे के बाल पर उस्तरा चला रहे बिहारी बिना कुछ पूछे ही बोल पड़ते हैं, हमें तो जो सुनेगा, उसे ही वोट देंगे।
जयकार नहीं काम का फनकार चाहिए
बर्न से आगे बढ़े तो हमें डीडीसी का चुनाव लड़ चुके सोमनाथ खजूरिया मिले। वे कहते हैं- देखिए, एक चीज मैं साफ कर देना चाहता हूं कि यहां के लोगों की जयकार की राजनीति पसंद नहीं है। जो यहां की समस्याओं को समझे, लोगों को समझ सके, ऐसा नेता चाहिए। पैराशूट लेकर कोई कूद पड़े और कहे कि हम दावेदार हैं, ऐसा नहीं चलेगा। साथ में मौजूद कौशल बीच में कूद पड़े। वे बोले, हमें ऐसा नेता चाहिए जो सिर्फ वादे न करे, उसे पूरा भी करे।
शिकायतों पर भारी जातीय गोलबंदी इस विधानसभा सीट पर राजपूत, अनुसूचित जाति, गुज्जर, ब्राह्मण और ओबीसी वोटर जीत-हार तय करते हैं। एक वर्ग मानता है कि राजपूत और ब्राह्मण बराबर हैं और जीत के समीकरण साधने में उनकी बड़ी भूमिका होगी, तो दूसरे वर्ग का मानना है कि अनुसूचित जाति के मतदाता बड़ा बदलाव ला सकते हैं। लोगों की बातचीत में भले ही शिकवा-शिकायतें उभरकर आती हों लेकिन एक बात साफ हो जाती है कि जीत की पटकथा जातीय गोलबंदी ही लिखेगी।
पिछले चुनावों की बात