जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने सोमवार को अपने अहम फैसले में कहा कि सरकार किसी कर्मचारी से लगभग तीन दशक तक सेवा लेने के बाद उसे कैजुअल वर्कर (अस्थायी कर्मचारी) नहीं कह सकती। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी सेवा का मतलब यह नहीं कि कर्मचारी की सीधी भर्ती आरक्षित उच्च पद पर किया जाए।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस राजेश सेखरी की डिवीजन बेंच ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की ओर से दायर दो याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। ये याचिकाएं सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट), जम्मू बेंच के उन आदेशों के खिलाफ थीं जो अफतार हुसैन के पक्ष में दिए गए थे। हुसैन वर्ष 1998 से रेशम पालन विभाग में काम कर रहे थे।
हाई कोर्ट ने हुसैन के नियमित होने के अधिकार को तो बरकरार रखा, लेकिन उन्हें चालक के तौर पर नियमित करने के ट्रिब्यूनल के निर्देश में बदलाव किया। बेंच ने सरकार को आदेश दिया कि उन्हें उस तारीख से अर्दली (चपरासी) के तौर पर तुरंत नियमित किया जाए, जिस तारीख को उन्होंने सात साल की सेवा पूरी की थी। यह भी कहा कि यह नियुक्ति एंट्री लेवल ग्रेड 345-460 रुपये में होनी चाहिए। यह प्रक्रिया उस तारीख से तीन महीने के भीतर पूरी की जानी है, जिस दिन अधिकारियों को फैसला उपलब्ध कराया जाएगा।
यह है मामला
हुसैन को रेशम पालन विभाग ने कैजुअल हैंड ड्राइवर के तौर पर रखा था। उनकी नियुक्ति समय-समय पर बढ़ाई जाती रही। सरकार का कहना था कि उन्हें जरूरत के आधार पर रखा गया था। उन्होंने हर महीने सीमित दिनों के लिए काम किया था। हुसैन का दावा था कि उन्होंने जुलाई 1998 में एक स्थायी ड्राइवर के रिटायर होने के बाद खाली हुई जगह पर लगातार काम किया।
ट्रिब्यूनल का आदेश
ट्रिब्यूनल ने बीते साल 22 सितंबर को जम्मू-कश्मीर सिविल सेवा (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2010 के तहत ड्राइवर के तौर पर नियमित करने और सेवा से जुड़े सभी लाभ व बकाया राशि देने के निर्देश दिए।
कोर्ट ने यह कहा
कोर्ट ने कहा कि जब कोई कर्मचारी काफी लंबे समय तक काम करता है, तो उसे कैज़ुअल वर्कर मानना सही नहीं होगा। यूटी प्रशासन और उससे जुड़े संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करें।
नियमित करने के आदेश को माना गलती
हाईकोर्ट ने मामले में यह भी पाया कि ट्रिब्यूनल ने उन्हें 475–850 रुपये के ऊंचे ग्रेड में ड्राइवर के तौर पर नियमित करने का आदेश देकर कानूनन गलती की थी। बेंच ने कहा कि कानूनी भर्ती नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।