भारत-पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा के नजदीकी इलाकों पर एक तरफ आतंक का कहर है, तो दूसरी तरफ सरकार की उपेक्षा का दंश। डेढ़ साल में तीन आतंकी हमले झेल चुके हीरानगर सब डिवीजन के लोग तो दहशत में हैं।
आतंकी हमले के पीड़ित के जख्म भी नहीं भर रहे। आतंकी हमले की विभीषिका के शिकार बने लोग और उनके परिवार सदस्यों की मानें, तो हमले के बाद वीआईपी लोगों ने ढेरों वादे किए। फौरी तौर पर मुआवजा और सुविधाएं देने का भरोसा दिलाया, लेकिन डेढ़ साल बीत जाने के बावजूद वादे पूरे नहीं हो पाए हैं।
26 सितंबर 2013 की सुबह आतंकियों द्वारा अगवा किए गए ऑटो चालक रोशन लाल को पूरा घटनाक्रम आज भी भुलाए नहीं भूलता। रोशन लाल ने बताया कि उस सुबह आतंकियों ने उसका ऑटो हाइजैक कर लिया था।
सीमावर्ती इलाके से हाईवे और फिर हीरानगर पुलिस थाने तक जबरन ले जाए जाने के बाद आतंकियों ने हमले से पूर्व उस पर गोलियां दाग दी थीं। तीन गोलियां उसके शरीर पर लगीं। सौभाग्य से उसकी जान बच गई। सरकार ने इलाज के लिए दस-बारह हजार रुपये की मदद दी और उसके बाद से केवल खोखले आश्वासन ही मिल रहे हैं।
इसी हमले में अपने भाई को खोने वाले सूरज का कहना है कि उनके परिवार के एक सदस्य को नौकरी देना तय हुआ था। भरोसा दिलाया गया कि इसमें कोई देरी नहीं होगी, लेकिन डेढ़ साल बाद भी रोजगार नहीं मिला।
सूरज का कहना है कि आतंकी हमले की भरपाई करना किसी भी सूरत में मुमकिन नहीं है, लेकिन पीड़ितों को सरकारी मदद देने में देरी करना अन्याय है। उन्होंने कहा कि या तो पीड़ितों को रोजगार देने का वादा न किया गया होता, या फिर वादा किया गया है, तो उसे निभाया जाना चाहिए।