आपके मेडिकल काॅलेज में एमबीबीएस की फीस कितनी है और सरकारी में कितनी है?
निजी सोसायटी, समिति की तरफ से संचालित किए जाने वाले मेडिकल काॅलेजों में प्रति वर्ष की फीस करीब पांच लाख रुपये है। सरकारी मेडिकल काॅलेजों में ये फीस मात्र 40 हजार रुपये ही है। काफी अंतर है। जो छात्र मेरिट के आधार पर बेहतर प्रदर्शन करते हैं उन्हें सरकारी काॅलेज मिलता है। वे निजी संस्थान में क्यों जाएंगे? मेरिट के आधार पर जो छात्र बचे हैं उनको प्राथमिकता, मेरिट व काउंसिलिंग के आधार पर सीटें आवंटित होती हैं। ये सभी मुस्लिम छात्र प्रवेश पाने में इसी आधार पर सफल हुए।
सीटों का बंटवारा किस तरह हुआ होगा? जरा समझाएं, किस आधार पर मेरिट बनी?
इस प्रक्रिया को इस तरह समझिए कि राज्य के अलग-अलग मेडिकल कॉलजों में 2000 सीटों के लिए कट ऑफ मेरिट जारी की गई। इसमें से 1685 सीटों के लिए काउंसिलिंग की गई। वरीयता के आधार पर 8 हिंदू छात्रों ने ही श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल को चुना। इसी तरह 42 मुस्लिम छात्रों ने संस्थान के प्रति रुचि दिखाई। इस कारण इनकी संख्या ज्यादा नजर आ रही है।
नियम तोड़ने पर कानून में प्रावधान क्या है?
नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) और जम्मू कश्मीर बोर्ड आॅफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्जामिनेशन (बोपी) की तरफ से लागू नियम काफी कड़े हैं, शायद ही कोई मेडिकल काॅलेज इनको तोड़ सकता है। यदि हमने नियमों के खिलाफ संस्थान में प्रवेश लिया है तो एनएमसी हमारी मान्यता तो रद्द करेगा ही, साथ ही 15 करोड़ रुपये जो हमने डिपाॅजिट किएा हैं वह भी जब्त कर लेगा। इसके बाद फिर नए सिरे से सभी औपचारिकताएं मेडिकल काॅलेज संचालन के लिए करनी होंगी जो काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
मुख्यमंत्री भी कह चुके मेरिट के आधार पर हुआ प्रवेश
यशपाल शर्मा ने साफ कहा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी प्रवेश को लेकर स्थिति साफ कर चुके हैं। शर्मा ने कहा कि संस्थान में 50 में से 42 सीटों पर मुस्लिम छात्रों का प्रवेश मजहब नहीं मेरिट के आधार पर हुआ है। फिर विवाद की स्थिति कहां बन रही है, यह समझ से परे है। इसमें छात्रों की क्या गलती है? आगे कहा कि जब विवि के लिए बिल पास किया गया था तब इसमें कहीं नहीं जिक्र किया गया कि यहां मजहब के आधार पर प्रवेश दिया जाएगा। कार्यकारी निदेशक ने कहा कि जो विरोध कर रहे हैं, इस बात को वे जानें। मैं यहां नियमों के तहत और नियमों का पालन कराने के लिए बैठा हूं।