श्रीनगर के डाउनटाउन स्थित बाना मोहल्ले में करीब 35 साल से वीरान पड़े 700 साल पुराने दुर्गेश्वरी मंदिर को नया जीवन मिला है। मस्जिद कमेटी और मुस्लिम पड़ोसियों ने हाथ बढ़ाया है। प्रशासन ने भी गंभीरता दिखाई है। कश्मीरी पंडित शशि टिक्कू ने बचपन की यादों से जुड़े दुर्गेश्वरी मंदिर को संवारने का बीड़ा उठाया है।
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वक्त के साथ इमारतें भले ही खंडहर में तब्दील हो जाएं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें और आस्था कभी खत्म नहीं होतीं। श्रीनगर के डाउनटाउन स्थित बाना मोहल्ले में करीब 35 साल से वीरान पड़े 700 साल पुराने दुर्गेश्वरी मंदिर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कश्मीर से विस्थापित होकर जम्मू में रह रहे एक कश्मीरी पंडित के बचपन की यादों ने इस ऐतिहासिक मंदिर को फिर से संवारने की उम्मीद जगा दी है।
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मंदिर की बदहाली देखकर विचलित हुए शशि टिक्कू ने अपने दम पर इसके जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया तो उन्हें अकेला नहीं रहना पड़ा। मंदिर के ठीक बगल में रहने वाले मुस्लिम पड़ोसी और स्थानीय मस्जिद कमेटी भी उनके साथ खड़ी हो गई। अब जिला प्रशासन ने भी इस पहल का संज्ञान लेते हुए मंदिर के समग्र विकास के लिए डीपीआर तैयार कराने का भरोसा दिया है।
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बाना मोहल्ला (फतेह कदल-ख्वाजा बाजार) स्थित यह मंदिर अपनी विशिष्ट अष्टकोणीय वास्तुकला के लिए जाना जाता है। स्थानीय मान्यताओं और इतिहास संबंधी जानकारियों के अनुसार इसका निर्माण सुल्तान जैन-उल-आबिदीन (बड़शाह) के दौर के आसपास का माना जाता है। मंदिर में माता दुर्गा के साथ प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है। शशि टिक्कू के अनुसार, इसका मूल नाम दुर्गेश्वरी मंदिर है। बाद में परिसर में बच्चों के लिए एनके स्कूल यानी पाठशाला संचालित होने के कारण यह दुर्गा पाठशाला मंदिर के नाम से भी पहचाना जाने लगा।
बचपन की यादों ने लौटाया अपने आस्था केंद्र तक
वर्ष 1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद मंदिर की नियमित देखरेख बंद हो गई। धीरे-धीरे परिसर झाड़ियों, जंगली पौधों और मलबे से भर गया। मंदिर के मुख्य गेट टूट गए और परिसर कचरा फेंकने का स्थान बन गया। हालात इतने खराब हो गए कि आसपास रहने वाले लोगों को भी दुर्गंध और गंदगी से परेशानी होने लगी। इसी दौरान मंदिर की प्राचीन मूर्ति भी चोरी हो गई।
जम्मू के जानीपुर में रह रहे शशि टिक्कू अगस्त में जब अपने पैतृक मोहल्ले पहुंचे तो मंदिर की हालत देखकर स्तब्ध रह गए। उनके लिए यह महज एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि बचपन और परिवार की स्मृतियों से जुड़ा आस्था का केंद्र था। वह बताते हैं, जब मैं 10 साल का था, तब अपने पिता स्वर्गीय पुष्कर नाथ जी और बुजुर्गों के साथ यहां पूजा करने आता था।
मंदिर को खंडहर और कचरे के ढेर में तब्दील देखकर मेरा दिल दहल गया। जब संस्थाओं और सभाओं से कोई ठोस मदद नहीं मिली तो मैंने खुद इसके जीर्णोद्धार का फैसला किया। तय किया कि अपनी जेब से खर्च करना पड़े तो भी इस धरोहर को लावारिस नहीं छोड़ूंगा।
मदद को आगे आए मुस्लिम पड़ोसी
मंदिर को संवारने की इस मुहिम में सबसे अहम भूमिका स्थानीय मुस्लिम समुदाय के सहयोग की रही। मंदिर के साथ लगती मस्जिद की कमेटी और आसपास के लोगों ने शशि टिक्कू का स्वागत किया और हरसंभव मदद का भरोसा दिया। स्थानीय लोगों को जब पता चला कि वह स्वर्गीय पुष्कर नाथ जी के बेटे हैं तो उन्होंने उनसे आत्मीयता से मुलाकात की। चाय-नाश्ते के साथ उनका हौसला बढ़ाया।
मोहल्ले के सेवानिवृत्त कर्मचारी फिरदौस ने परिसर में बिजली की व्यवस्था कराने में मदद की। स्थानीय लोगों का कहना था कि मंदिर की सफाई और परिसर का विकास पूरे मोहल्ले के हित में है। वे चाहते हैं कि यहां स्वच्छ वातावरण के साथ एक सुंदर पार्क भी विकसित हो।
शशि टिक्कू ने जम्मू में रह रहे बाना मोहल्ले के पुराने विस्थापित परिवारों को जोड़ने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया। मौजा, कौल और राजधान परिवारों के सदस्यों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार 500, 1000 और 3100 रुपये तक की सहायता भेजी। छोटी-छोटी आर्थिक मदद और स्थानीय लोगों के सहयोग से इस काम को आगे बढ़ाया गया।