ज्यौड़ियां। शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा... यह लाइन देश की आन बान और शान के लिए कारगिल युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों में पर सटीक बैठती है। मौजूदा समय में देश सहित प्रदेशभर में उनका शहीदी दिवस मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में सोमवार को चक मलाल निवासी अनिल मन्हास के 19वें शहीद दिवस पर ज्यौड़ियां-पलांवाला मार्ग पर तरोटी स्थित शहीदी स्मारक पर विशेष कार्यक्रम हुआ। इसमें सेना की 49 आर्म्ड कोर के कर्नल अंकुर कुमार मुख्य रूप और सेवानिवृत्त कर्नल रबेल सिंह चौधरी पैरा कमांडो विशेष तौर पर उपस्थित रहे। इसके साथ ही परिजनों, रिश्तेदारों और क्षेत्रवासियों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सनद रहे कि वह 14 जैक राइफल रेजिमेंट के सिपाही के पद पर तैनात था और नौ जुलाई को टाइगर हिल पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहादत का जाम पिया था।
बेटे की याद कर मां-बाप की आंखों से छलक रहे थे आंसु
19वें शहीदी दिवस पर बेटे को याद कर पिता सेवानिवृत्त रतन सिंह और माता सिमरो देवी की आंखों से आंसु छलक रहे थे। कोई उन्हें ढांस बंधा रहा था तो कोई बेटे की बहादुरी पर कसीदे पढ़ कर दुख की घड़ी से बाहर निकालने की कोशिश में लगा था। पूरा माहौल ही देशभक्ति और अपनों के बिछुड़ने के गम में सराबोर था।
शहादत से पहले तिरंगा फहराने का रास्ता कर दिया था साफ
शहीद अनिल मन्हास के छोटे भाई सुनील मन्हास ने बताया कि दोनों एक ही यूनिट में तैनात थे। इसके अलावा टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने की इच्छा लेकर दो भाई एक साथ जंग में गए थे। लेकिन अनिल मनहास मिशन पूरा होने से एक कदम पहले दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। लेकिन इससे पहले उन्होंने टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने का रास्ता साफ कर दिया था।
हवन-यज्ञ का हुआ आयोजन
कार्यक्रम में सबसे पहले शहीद के पिता रतन सिंह मन्हास, माता सिमरो देवी, पत्नी वीना देवी, भाई सुनील मन्हास और विंकल सिंह, बेटे इंद्रजीत सिंह ने याद किया। कार्यक्रम में शहीद की आत्मा की शांति के लिए हवन-यज्ञ का आयोजन किया गया और इसके बाद भंडारा हुआ।
...शहीदों के परिजनों को राज्य में नहीं मिलता उचित सम्मान
चक मलाल निवासी सेवानिवृत्त मदन सिंह चिब, सेवानिवृत्त मास्टर रछपाल सिंह चिब, फकीर सिंह चिब और कुलवंत सिंह ने बताया कि जांबाज अनिल मन्हास की कमी जिन्दगी भर खलती रहेगी। अफसोस इस बात का है कि राज्य में शहीदों के परिजनों को वह सम्मान नहीं मिलता है, जिसके वह हकदार हैं। प्रशासन का कोई भी अधिकारी श्रद्धांजलि देने ने जहमत नहीं उठाता है। पहली बार सेना के एक अधिकारी ने शिरकत की है। सभी लोगों का फर्ज बनता है कि ऐसे कार्यक्रमों में शामिल हो कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।