कठुआ। बसोहली चित्रकला को बढ़ावा देने में कई कलाकार जुटे हैं। बसोहली में यह काम विश्वस्थली संस्था कर रही है। संस्था की तरफ से लगाए गए चित्रकला शिविर में इन दिनों रागमाला पर चित्र बनाए जा रहे हैं। इसके बाद विश्व स्थली संस्था द्वारा लगाए जाने वाले अगले शिविर में गीत गोविंद और रसमंजलि पेंटिग पर काम किया जाएगा। वर्ष में दो बार चित्रकार चित्रकला शिविर में भाग लेते हैं। धीरे-धीरे बसोहली पेंटिग सेंटर एक अच्छा संग्रहालय बन जाएगा, जो पर्यटकों को आकर्षित करेगा। इस काम में न केवल राज्य, बल्कि हिमाचल के चित्रकार भी अपना योगदान दे रहे हैं। इन कलाकारों ने अमर उजाला से खास बातचीत में बसोहली चित्रकला ने किस तरह उड़ान भरी, इस बारे में विस्तार से अपनी बात रखी।
चंबा के कलाकार परीक्षित शर्मा ने कहा कि बसोहली एक छोटा सा कसबा है। इस छोटी सी जगह से एक बड़ी कला ने ऊंची उड़ान भरी। आज इसकी प्रसिद्धि पूरे विश्व में फैल चुकी है। बसोहली के राजा कृपाल पाल के समय में बहुत से कलाकार पेंटिंग बनाने का काम करते थे। उन्होंने रसमंजलि और गीत गोविंद पर आधारित चित्र बनाए। आज दुनिया के बड़े-बड़े संग्रहालयों में बसोहली पेंटिंग देखी जा सकती है। विश्वस्थली संस्था इसके संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास कर रही है, ताकि कलाकारों को प्रोत्साहन मिले और अधिक से अधिक कलाकार इस कला शैली से जुड़ें।
चंबा के कलाकार भुवनेश्वर शर्मा ने कहा कि विश्व स्थली संस्था ने बसोहली पेंटिग के पुराने वैभव को जीवंत करने की कोशिश की है। संस्था ने अपनी एक गैलरी बनाई है, जिसमें वह अपना स्कूल चला रही है। यहां छात्र पेंटिंग सीख रहे हैं। बसोहली पेंटिग के अच्छे उदाहरण और नमूने जो विदेशों में हैं, उसकी अच्छी कापी बनाकर पेंटिग गैलरी में प्रदर्शित की जा सकती है। यह पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहेगी। बसोहली में एक ऐसी आर्ट गैलरी की जरूरत है, जहां पुराने समय की बसोहली कला देखने को मिल जाए। इसी दिशा में विश्वस्थली संस्था काम कर रही है और हिमाचल, चंबा के चित्रकार भी उनके साथ सहयोग कर रहे हैं।
चंबा के कलाकार पद्मश्री विजय शर्मा ने कहा कि 16 वर्ष की आयु से पेंटिग से लगाव हो गया था। राजाओं के समय की पेंटिंग को चंबा के म्यूजियम में देखते थे। प्राचीन कला को जीवंत करने की कोशिश जारी रखी। राजस्थान और बनारस में पेंटिंग के गुर सीखने के बाद पेंटिंग बनाने का सफर शुरू हुआ। पेंटिंग एक कला है, जिसे राजाओं ने संरक्षण दिया। उस समय दरबारी चित्रकार रजवाड़ों के लिए चित्र बनाने का काम करते थे। चंबा में चंबा रुमाल पेंटिंग और मूर्तिकला धातु जैसी कलाएं आज भी जीवंत है। इस पर आज भी चंबा के कलाकार काम कर रहे हैं। आज कलाकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग आर्ट गैलरी में तो देखी जा सकती है, लेकिन राजाओं के समय में कलाकारों का जो मान-सम्मान था, वह आज के समय में खत्म हो चुका है।
कांगड़ा के चित्रकार धनीराम ने बताया कि पिछले दस से बीस वर्षों में बहुत सी पहाड़ी चित्रकला पर किताबें प्रकाशित हुई हैं। देश-विदेशों में प्रदर्शनी के दौरान चित्रकला की काफी प्रसिद्धि हुई है। चित्रकला के कद्रदान भी बढ़े हैं। इससे यह उम्मीद बंधी है कि भविष्य में भी यह कला जीवंत रहेगी। इस क्षेत्र में युवक और युवतियां अपना भविष्य बना सकती हैं।