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पलायन के 30 साल: ससम्मान घाटी में वापसी की राह देख रहे कश्मीरी पंडित

Sun, 19 Jan 2020 11:13 AM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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कश्मीरी पंडित
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घाटी से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को 30 साल पूरे हो गए हैं। अब भी जम्मू के जगती व पुरखू कैंप और उधमपुर में रह रहे पंडितों की आंखों में 19 जनवरी 1990 की पीड़ा अनायास ही झलक पड़ती है। घाटी में जमीन और घर होने के बाद भी विस्थापितों का दर्द झेलने की विवशता उनके चेहरे पर साफ दिखती है। केंद्र सरकार की ओर से घाटी में ससम्मान वापसी के किए गए वायदे के पूरा न हो पाने से आक्रोश भी साफ दिखाई देता है।

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जगती विस्थापित कैंप में रहने वाले लोग आवास और सुविधाओं को लेकर खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि आवास काफी जर्जर हालत में पहुंच गए लेकिन कोई सुध नहीं लेता। जगती निवासी सुनील पंडिता का कहना है कि सरकार को कम से कम आवासीय कालोनी में सुविधाएं विकसित करनी चाहिए ताकि विस्थापितों को और परेशानी का सामना न करना पड़े।

गत 10 अगस्त को विदेशी राजनयिकों ने जब विस्थापित कैंप का दौरा किया तो कश्मीरी पंडितों ने उनके समक्ष अपनी पीड़ा रखी। इस दौरान इस्लामिक आतंकवाद से बचाने संबंधी प्लेकार्ड लेकर पंडितों ने गुहार लगाई।
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आतंकवाद के चलते 70 साल पहले घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों की कहानी

1947 में जम्मू-कश्मीर राज्य के बंटवारे और आतंकवाद के चलते 70 साल पहले घाटी से विस्थापित होने वाले हिंदू-सिख समुदाय के सात लाख लोगों को उनकी भावनाओं के अनुरूप एक स्थान पर बसाए जाने और 1999 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की घोषणा के अनुरूप कश्मीर में हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों के नरसंहार की जांच के लिए विशेष ट्रिब्यूनल का गठन करने की मांग की।

पनुन कश्मीर के नेता अश्विनी चुरूंगू ने कहा कि हिंदू-सिख समुदाय के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए परिसीमन में विधानसभा की पांच सीटें आरक्षित की जानी चाहिए। इसके साथ ही बेरोजगारों के लिए विशेष भर्ती अभियान भी चलाया जाना चाहिए।
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