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23 साल की उम्र में देश पर कुर्बान हुए

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कठुआ/हीरानगर। राजोरी में एलओसी पर पाकिस्तान की गोलाबारी में शहीद जवान शुभम सिंह का पार्थिव शरीर सोमवार को जब जंगलोट सैन्य कैंप से उनके पैतृक गांव मुकंदपुर चौधरियां की ओर रवाना किया गया तो पूरे रास्ते शहीद शुभम सिंह अमर रहे और भारत माता की जय हो की गूंज सुनाई देती रही। शुभम सिंह अभी महज 23 साल के ही थे। गौरतलब है कि इसी उम्र में शहीद भगत सिंह देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था।
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सोमवार की शाम पांच बजे जंगलोट कैंप से सेना की 15 लाइट इंफेंट्री के जवान शुभम सिंह का पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक गांव मुकंदपुर चौधरियां भेजा गया तो पूरे रास्ते लोग उनकी वीरता के गुणगान करते नजर आए। कुछ लोग कहते नजर आए कि मुकंदपुर में भी एक भगत सिंह देश के लिए कुर्बान हो गया। भारत-पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित हीरानगर सब डिवीजन के गांव मुकंदपुर चौधरियां में सोमवार सुबह से लोग शुभम सिंह के पार्थिव शरीर के गांव में पहुंचने की प्रतीक्षा कर रहे थे। गांव के हर शख्स के चेहरे पर दुख और गर्व की झलक एक साथ दिख रही थी। लोगों को दुख इस बात का था कि 23 साल का गांव का नौजवान अब उनके बीच नहीं रहा, लेकिन गर्व इसका कि उसने देश के लिए कुर्बानी देकर गांव और जिले का नाम रोशन किया।
रविवार को राजोरी में एलओसी के नजदीक पाकिस्तानी गोलाबारी में शहीद हुए चार जवानाें में शुभम भी शामिल थे। सोमवार को मुकंदपुर चौधरियां गांव में शहीद शुभम सिंह के अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। हाईवे से ही गांव के युवा तिरंगा लेकर पहुंच गए थे। गांव में शुभम की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए बड़ी तादाद में लोग पहुंचे। इस मौके पर वन मंत्री चौधरी लाल सिंह, विधायक कुलदीप राज, डीसी कठुआ रोहित खजूरिया समेत सेना के अधिकारियों ने शहीद को अंतिम विदाई दी।
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परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल
सोमवार सुबह सेना की 15 लाइट इंफेंट्री के जवान शुभम सिंह की शहादत की खबर जैसे ही गांव में पहुंची पूरा गांव गम में डूब गया। गांव की गलियों में सन्नाटा छा गया और शहीद के घर से रोते बिलखते परिजनों की आवाज गांव में गूंज रही थी। शुभम के माता-पिता और तीन बहनों का रो-रो कर बुरा हाल था। शुभम के बचपन के दोस्तों की आंखें नम थीं। दो साल पहले सेना में भर्ती हुए शुभम ने कश्मीर में प्रशिक्षण हासिल किया। इसके बाद उसकी पोस्टिंग कुछ समय के लिए राजस्थान रही। पिछले एक साल से शुभम राजोरी में तैनात था।
परिवार का एकमात्र सहारा था शुभम
किसान पिता के पूरे परिवार में शुभम एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति था। शुभम की मौत से परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। पांच भाई बहनों में से एक शुभम की बड़ी बहन की शादी हो चुकी है जबकि दो बहनों की अभी शादी होनी है। एक भाई है परिवार के गुजर-बसर के लिए खेती में पिता का हाथ बंटाता है। शुभम की नौकरी लगी तो परिवार को भी अच्छे दिन की आस दिखी। शुभम ने परिवार के सपनों को पूरा करना भी शुरू कर दिया। कच्चे मकान में बचपन बिताने के बाद परिवार का सहारा बनते ही उसने जैसे-तैसे मकान को पक्का बनवाने का काम शुरू किया। अभी मकान की चहारदीवारी का ही काम चल रहा था, लेकिन आगे के सपनों को शुभम पूरा नहीं कर पाया।
‘शुब्बू तुम कहां चले गए’
शुभम के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लिपटा देख उसकी बहनों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वे बस यही कह रहीं थी हमें शुब्बू वापस चाहिए। शुब्बू तुम हमें छोड़कर कहां चले गए। बहनों का कहना था कि जिस भाई को सेहरा बांध कर शादी करनी थी, उसके पार्थिव शरीर को हम कैसे देखें। यह सब देख पिता भी खुद को नहीं रोक पा रहे थे। शुभम की बूढ़ी दादी और उनकी मां का रो-रोकर बुरा हाल था। परिवार के कई सदस्यों को शुभम के अंतिम दर्शन तक मय्यसर नहीं हुए। शव को जैसे ही अंतिम संस्कार के लिए ले जाने का काम शुरू हुआ उसकी बहनें बेहोश होकर गिर पड़ीं। सेना के अधिकारियों ने ताबूत में ही सारी रस्मों को पूरा करवाया। बहनों ने ताबूत पर ही हार और सेहरा बांध कर रस्मों को पूरा किया।
दोस्त को नहीं पता था कि यह उसकी शुभम से आखिरी मुलाकात है
शुभम के दोस्त पंकज ने बताया कि एक महीना छुट्टी काटने के बाद वह शुभम को 27 जनवरी को ही वापस जाने के लिए चढ़वाल में छोड़कर आया था। इससे पहले दोस्तों ने मिलकर कोटपुन्नू में गणतंत्र दिवस समारोह भी देखा था। शुभम में देशभक्ति और सेना में जाने का जज्बा बचपन में ही था। पंकज ने कहा कि आज पूरा देश शुभम की शहादत से दुखी है और गांव वासी भी इससे नहीं उबर पा रहे हैं। अपने खास दोस्त पंकज से शुभम की बात रविवार दोपहर को हुई थी। इसी दौरान पंकज ने उससे सीमा पर हालात के बारे में जानना चाहा, लेकिन शुभम ने कहा कि सब ठीक है। इसके बाद उसने पंकज से कहा कि जिस पोस्ट पर वह ड्यूटी देने जा रहा है, वहां मोबाइल सिगनल नहीं होगा, लिहाजा एसटीडी से ही कॉल करेगा। पंकज को दुख है कि वह अपने दोस्त से इसके बाद कभी नहीं मिल पाया। उसे गर्व भी है कि उसके दोस्त ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

कड़े कदम उठाए सरकार
शुभम के शिक्षक और रिश्तेदार महेश का कहना था कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि शुभम देश के लिए इतना बड़ा काम कर जाएगा। अभी दो साल पहले ही उसने सेना में नौकरी ज्वाइन की थी। वो परिवार के लिए ज्यादा समय भी नहीं दे पाया। उन्होंने कहा कि पूरे इलाके में शोक की लहर है। तकलीफ इस बात की है कि सीमा पर लगातार खराब हालात बन रहे हैं। सीमा पर रोज ही हमारे जवान शहीद हो रहे हैं। सरकार को अब पाकिस्तान को कड़ा सिखाना चाहिए।

युवाओं की रैली में गूंजे शुब्बू भाई अमर रहे के नारे
हीरानगर। शहीद शुभम सिंह के गांव के लोगों में पाकिस्तान व केन्द्र सरकार के खिलाफ रोष देखने को मिला। युवाओं ने रोष रैली निकालकर पाकिस्तान के खिलाफ नारेबाजी की। स्थानीय लोगों ने पाकिस्तान से आर-पार की लड़ाई की मांग की। शुब्बू भाई अमर रहे के नारे लगाते हुए गांव के युवाओं ने रैली निकाली, जो साझी मोड़ से होते हुए चड़वाल पहुंची। मुख्य चौक में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए लगाते हुए युवाओं ने सरकार से पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। रैली में शामिल पूर्व सरंपच राकेश चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। इसलिए अब उस पर बड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। स्थानीय लोगों ने हरियाचक मोड़ के नजदीक पहुंचकर जमकर नारेबाजी कर पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन किया। ब्यूरो
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