जिम्मेदार सरकारी पदों पर बैठे उच्च अफसरों के खिलाफ लंबित 147 विभागीय जांच में हो रही देरी पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश एन पाल वसंथाकुमार और जस्टिस ताशी राबस्तन की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर याचिका में पाया कि 13 प्रशासनिक विभागों के सचिवों को प्रतिवादी बनाया गया, जिन्होंने जांच में ढिलाई बरती।
अदालत ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सभी 13 प्रशासनिक सचिवों को दो सप्ताह के अंदर लंबित विभागीय जांच की रिपोर्ट पेश करने को कहा है। यदि वह ऐसा करने में असफल रहते हैं तो 23 फरवरी को होने वाली मामले की सुनवाई में वह खुद अदालत में उपस्थित हों।
दो समाज सेवी शेख मोहम्मद सफी और प्रो, एसके भल्ला की ओर से दायर जनहित याचिका में 147 विभागीय जांच में देरी का मुद्दा उठाया गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील शेख शकील अहमद और राहुल रैना ने खंडपीठ का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि 17 दिसंबर 2015 को इसी अदालत ने सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) को लंबित जांच रिपोर्ट दो सप्ताह में पेश करने के आदेश दिए थे।
इसके बावजूद जीएडी रिपोर्ट पेश करने में असफल रहा। वकील ने चार नवंबर 2015 को जीएडी की ओर से पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि जीएडी ने खुद को असहाय बताया था।
उसका कहना है कि सिर्फ पांच विभागों ने ताजा रिपोर्ट दी। शेष विभागों की रिपोर्ट का अभी भी इंतजार है। जिन पांच विभागों ने रिपोर्ट पेश की, उन्होंने भी पुरानी रिपोर्ट ही रखी है।
उनका कहना था कि इसमें कोई नई बात नहीं हुई। उनका कहना था कि चार अप्रैल 2014 को भी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एमएम कुमार ने भी विभागीय जांच को गंभीरता से न लेने पर नाराजगी जताई थी।