कल तक जो खेत धान की फसलों से हरेभरे दिखाई दे रहे थे, वहां आज रेत और बजरी दिखाई दे रही है। पिछले महीने के पहले सप्ताह में आई भीषण बाढ़ ने धान की सैकड़ों एकड़ भूमि पर लगी फसल को तबाह कर दिया। अब हाल यह है कि खेती योग्य यह जमीन अब बंजर का डर सता रहा है।
बाढ़ ने फसलों को बहाकर खेतों में रेत और बजरी के ढेर लगा दिए हैं। पानी के तेज बहाव के चलते खेतों में नाले बन गए। अब ये खेत दरिया और टापू के शक्ल में दिख रहे हैं। बसंतर और देविका की धारा बदलकर अब खेतों से होकर बह रही है। कई किसानों को यह पता नहीं चल पा रहा है कि उनके खेत कहां हैं।
बड़ी बात यह है कि क्षेत्र के कई किसानों ने ठेके पर धान की खेती की थी। उनका लाखों रुपये डूब गया है। ये खेत अब ऊबड़-खाबड़ हो गए हैं। वर्तमान में इन खेतों पर फसल उगाना लगभग नामुमकिन लगता है। खेती करने के लिए पहने जमीन को समतल करना पड़ेगा और रेत को हटाना होगा। यह मुश्किल भरा काम है।
किसान सुरजीत चौधरी, कमल चौधरी, सोहन सिंह आदि ने कहा कि रंगूर कैंप, नंगा, बरौटा कैंप, कमौर कैंप समेत दर्जनों गांवों में देविका और बसंतर का सुरक्षा बांध टूटने बाढ़ आ गई थी। इससे घर तो तबाह हुए ही, फसलें भी बह गईं। किसानों का कहना है कि अब उन्हें अपने परिवार के भविष्य की चिंता सता रही है। सरकार की ओर से ऐसा अभी कुछ नहीं किया गया है जिससे तसल्ली मिले। उन्हें सरकारी मदद का इंतजार है।