- जिला विकास आयुक्त सलोनी राय की अध्यक्षता में समारोह का समापन
- आपात परिस्थितियों से निपटने के किए गए थे पुख्ता इंतजाम
उधमपुर। देविकानगरी में विजयदशमी धूमधाम से मनाई गई। शहर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शोभायात्रा निकाली गई। इसके बाद सुभाष स्टेडियम में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाए गए। इस मौके पर जिला प्रशासनिक, पुलिस अधिकारियाें, राजनेता, समाज सेवक, वरिष्ठ नागरिकों सहित भारी संख्या में स्थानीय एवं दूरदराज से आए लोगों ने हिस्सा लिया।
मंगलवार को दोपहर साढ़े 3 बजे के करीब चबूतरा बाजार से शोभायात्रा निकाली गई। इसमें राम, सीता, लक्ष्मण एवं भरत दरबार, हनुमान एवं उनकी वानर सेना की झांकियां शामिल थी। ढोल नगाड़ों के साथ शोभायात्रा मुख्य बाजारों से होते हुए धार रोड के रास्ते 5 बजे सुभाष स्टेडियम पहुंची। झांकियों के स्वागत के लिए जगह-जगह स्टाल लगाए गए थे। समारोह स्थल पर यात्रा के स्वागत के लिए आतिशबाजी हुई।
जिला विकास आयुक्त सलोनी राय ने अन्य प्रशासनिक अधिकारियों एवं आयोजक समिति के पदाधिकारियों के साथ झांकी में शामिल राम, सीता, लक्ष्मण, भरत एवं हनुमान सहित अन्य कलाकारों का स्वागत किया। इसके बाद हनुमान ने पूरे दशहरा स्थल की परिक्रमा करने के बाद सीता माता को बाहर निकाल कर लंका दहन की। साथ ही भगवान राम ने कुंभकरण, मेघनाद के बाद आखिर में रावण के पुतले का दहन किया। दशहरा उत्सव समिति ने 35 फुट रावण और 30-30 फुट के कुंभकरण और मेघनाद का पुतला तैयार किया था। इस पर लगभग 1.65 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि पूरे समारोह पर ढ़ाई से तीन लाख रुपये का खर्च आया। समारोह के दौरान किसी तरह की आपात परिस्थिति से निपटने के लिए चिकित्सा, पीने के पानी की व्यवस्था सहित एंबुलेंस एवं फायर ब्रिगेड तैनात की गई थी। समारोह स्थल की ओर जाने वाले वीआईपी रोड के प्रवेश द्वार पर ही बैरिकेडिंग कर वाहनों की आवाजाही को बंद कर दिया गया। सिर्फ वीआईपी वाहनों को समारोह स्थल तक प्रवेश करने की अनुमति दी जा रही थी।
जली हुई लकड़ी के लिए मची होड़
रावण दहन के बाद लोगों में मान्यता है कि रावण के पुतले की जली हुई लकड़ी को घर में रखने से सब मंगल होता है। ऐसे में जैसी ही प्रशासन एवं आयोजक पुतला दहन करने के बाद समारोह स्थल से रवाना होने लगे तो लोगों की भीड़ पुतलों की तरफ दौड़ पड़ी और जली हुई लकड़ी उठाने लगे। पुतले के अवशेषों में आग अभी भी झुलस रही थी और कुछ देर-देर बाद आतिशबाजी भी हो रही थी। ऐसे में सुरक्षा एहतियात बरतते हुए पुलिस की मौजूदगी में फायर ब्रिगेड के कर्मियों ने पानी की बौछार से आग को बुझा दिया। ताकि लकड़ी लेते समय कोई भी हादसे का शिकार न हो।
जलते पुतलों के अवशेष को पानी से बुझाने पर रोष
-हिंदूओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया
उधमपुर। वहीं आग को पानी से बुझाए जाने को लेकर लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। वरिष्ठ नेता अश्वनी खजूरिया, पार्षद सुनील परोच, पूर्व सरपंच संजय शर्मा एवं कुलदीप सरपंच का कहना था कि हिंदू धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार के दौरान चिता को कभी भी पानी डाल कर नहीं बुझाया जाता। उनका आरोप था कि दशहरा आयोजक कमेटी सिर्फ प्रशासनिक अमले के साथ अपने ताल से ताल मिलाने के लिए समारोह में सिर्फ खानापूर्ति करती नजर आई। कमेटी के पदाधिकारियों एवं सदस्यों का फर्ज बनता था कि जब तक पुतलों की आग पूरी तरह से न बुझ जाए और समारोह स्थल से लोगों की भीड़ खत्म न हो जाए तब तक समारोह स्थल पर मौजूद रहें। मगर पुतला दहन करने के बाद जैसे ही प्रशासनिक अमला समारोह स्थल से रवाना होने लगा तो आयोजक भी उनके पीछे-पीछे दौड़ पड़े और पुतलों की तरफ दौड़ने लगे। इनमें अधिकतर बच्चे शामिल थे। इस कारण फायर ब्रिगेड को पानी डालकर आग को बुझाना पड़ा। अंतिम संस्कार के दौरान आग को पानी से बुझाना हिंदू की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कृत्य है। इसका विरोध करते हैं। इस बारे में दशहरा उत्सव समिति के संचालक सतपाल सल्लन का कहना था कि प्रशासन ने सुरक्षा कारणों के चलते यह कदम उठाया है, लेकिन हिंदू सभ्यता एवं संस्कारों के मुताबिक चिता की आग को पानी से बुझाना सरासर गलत है।