कैप्टन तुषार के शहीद होने की खबर जैसे ही उसकी मां को मिली कि वह जैसे पत्थर की हो गई। सुधबुध खो बैठी। आंखें पथरा गईं। एक कतरा आंसू नहीं छलक पाया। चीखने-चिल्लाने की हिम्मत भी न जुटा पाईं।
उनकी ऐसी हालत देखकर हर कोई स्तब्ध था। किसी को इतनी हिम्मत नहीं थी कि रोकर दिल का बोझ हलका करे। कैप्टन तुषार के घर का माहौल अचानक बदल गया। उसके घर में बड़े भाई की शादी की तैयारियां चल रही थी।
खुशी का माहौल था। कुछ दिन पहले तुषार ने खुद की मनपसंद कलर से घर को रंगवाया था। लेकिन सारी खुशियां मातम में बदल गई। इस सदमे ने पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया। मां इतनी बदहवास हो गईं कि दिल में बेटे के प्रति प्यार का जो गहरा सागर होता है, वह जैसे सूख गया।
मनहूस खबर सुनकर भी न तो उनकी आंखों से आंसू निकल पाए और न ही मुंह से चीत्कार। लोग उन्हें हिम्मत देने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन उनकी पथराई आंखें वहां के माहौल को और भी गमगीन कर रहा था। आसपास और संगे संबंधी भी तुषार की मां की आंखों में आंसू नहीं ला पाए।