उधमपुर। रठियान पंचायत के खरूनी इलाके में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का सोमवार को समापन हो गया। इस अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन कर भोग डाला गया।
नौ दिनों से चल रही कथा के अंतिम दिन कथावाचक सुभाष शास्त्री ने कहा कि यदि मनुष्य गलत विचारों को त्याग सके तो दैवीय विचारधारा स्वयं उसके भीतर प्रवाहित होने लगेगी। अपने विचार, अपने शब्द, अपने कर्म, अपने चरित्र और अपने मन पर सदैव नजर रखो। बुद्धि के द्वार बंद मत रखो। अज्ञान का पर्दा हटा दो। दैवीय विचारधारा में स्नान करो तो स्थायी शांति को प्राप्त हो जाओगे।
उन्होंने संगत को समझाया कि बिना शर्त प्रभु में विश्वास रखो। बिना अहंकार सेवा करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। पवित्र हृदय भगवान का मंदिर होता है। भगवान प्रेम है। और, जहां प्रेम है, वहीं भगवान मौजूद हैं। अधिक से अधिक प्रेममय बनो। सबसे प्रेम करो। एक बात याद रखो, अगर प्रेम में आसक्ति हो तो वह प्रेम नहीं रहता। मोह हो जाता है। और अगर प्रेम में आसक्ति न हो तो वह प्रेम नहीं रह जाता, भक्ति हो जाता है।
उन्होंने कहा कि प्रेम तो मोह और भक्ति के बीच की अवस्था है। मध्यम मार्ग है। ऐसा मार्ग, जो संसार की तरफ भी यात्रा करा सकता है, और संसार से मुक्त कर भगवान की तरफ भी यात्रा करा सकता है। ऐसा प्रेम सब में परमात्मा को देखने लगता है। इसलिए, परमात्मा को देखने के लिए आसक्ति रहित प्रेम होना चाहिए। भक्ति व्यक्ति को भक्त बना देती है। और, भक्त ही भगवान से मिल सकता है।
कथावाचक ने कहा कि परमात्मा को पाने के लिए प्रेम और भक्ति को अनिवार्य माना गया है। जिन महापुरुषों ने भगवान की अनुभूति पाई है, उन्होंने भगवान को पाने का यही मार्ग बताया है कि आसक्ति रहित प्रेम करो तो भक्ति कर सकोगे, और परमात्मा को पा सकोगे। संत तुलसीदास कहते हैं कि जाके हृदय भगति जस प्रीती। प्रभु तहं प्रगट सदा तेहि रीती।
उधमपुर के रठियान में श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथा सुनाते सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्ध?- फोटो : UDHAMPUR