उधमपुर। आधुनिक जीवनशैली और सोशल मीडिया के बढ़ते चलन के बीच आपसी रिश्ते डिजिटल स्क्रीन तक सिमट कर रह गए हैं। स्मार्टफोन की बढ़ती लत ने न केवल बातचीत का तरीके बदला है बल्कि समाज में तनाव और अकेलेपन की नई चुनौती खड़ी कर दी है। आज के दौर में एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद लोग आपस में बात करने के बजाय मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। यह डिजिटल गैप बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को प्रभावित कर रहा है। जानकारों का मानना है कि पहले जो बातें आपस में बैठकर सुलझ जाती थीं, अब वे संवाद की कमी के कारण मानसिक दबाव का रूप ले रही हैं।
युवाओं में यह समस्या और भी गंभीर है। सोशल मीडिया पर दूसरों की शानदार जिंदगी से तुलना उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर रही है। देर रात तक स्क्रीन का उपयोग न केवल आंखों को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि नींद की कमी और चिड़चिड़ेपन का मुख्य कारण बन रहा है। इससे युवाओं में तनाव और एंग्जायटी का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
मोबाइल के उपयोग नियंत्रित करें
डॉ. सुदेश रैना के अनुसार मोबाइल के अनियंत्रित उपयोग से मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। लोगों को परिवार के साथ समय बिताना चाहिए और सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनानी चाहिए। मनोचिकित्सक डॉ. हामिद इस्माइल का कहना है कि लोग भावनाओं को दबाने के बजाय व्यक्त करना सीखें। अगर लगातार उदासी या अकेलापन महसूस हो तो इसे नजरअंदाज न करें और विशेषज्ञ की सलाह लें। खुद की तुलना दूसरों से करना बंद करें और पसंद के कार्यों में मन लगाएं।