उधमपुर। रठियान में जारी श्रीमद्भागवत कथा में सोमवार को संत सुभाष शास्त्री ने संगत को समझाया कि वह अपना उद्धार कैसे कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत, महापुराण या देवी भागवत अथवा किसी और पुराण में दिए गए दृष्टांत सुनते हैं, लेकिन आचरण किसी एक पर भी नहीं करते हैं। मन ही मन सोचते हैं कि यह कथाएं करने से मनुष्य का कल्याण हो जाता है। यदि मनुष्य सदा-सदा के लिए लाभ चाहते हों, तो बस केवल इतना मान लो और जान लो कि मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं। इस तथ्य को इस प्रकार समझें कि लहर जब तक अपने को लहर मानती रहेगी, उसे जल में रहते हुए, जल का होते हुए भी मिटने का डर सताता रहेगा। परंतु जब इसे इस बात का ज्ञान हो जाएगा कि वह जल से ही उपजी है और अंतत: जल में ही उसे मिलना है तो उसको मिटने के भय से मुक्ति मिल जाएगी।
यह भली प्रकार समझ लें कि आप आत्मा हैं, शरीर नहीं जो नाशवान है। आत्मा अविनाशी है, इसे कोई मार नहीं सकता, बस इतना ज्ञान जब होने पर सब कष्ट समाप्त हो जाएंगे। केवल मनुष्य जन्म ऐसा है जिसमें जीव कर्म करने के लिए पूर्णता स्वतंत्र होता है। क्योंकि बुद्धिवाला होने से वह अच्छे-बुरे को समझ सकता है। यह स्थिति अन्य योनियों में जीव को उपलब्ध नहीं, इसलिए समझदारी यही है कि मनुष्य कर्म का पालन कर केवल शुभ कर्म ही करे, पाप के विषय में सोचे भी नहीं, क्योंकि उससे पतन और विनाश सुनिश्चित होता है। मंगलवार को इस कथा का समापन हो जाएगा तथा इस उपलक्ष्य में कथा समाप्ति के उपरांत भंडारा होगा।