उधमपुर। फंग्याल-रठियान के रत्ना मोती फार्म में श्रीमद् देवी भागवत कथा 6वें दिन भी जारी रही। कथा वाचक संत सुभाष शास्त्री ने संगत को समझाया कि शांति की तलाश हर मानव को रहती है, इसलिए वह मृग की तरह सारी उम्र भटकता रहता है। जबकि कस्तूरी तो मृग की नाभि में विद्यमान रहती है। ठीक इसी प्रकार शांति मनुष्य के भीतर होती है और वह उसे जगत में खोजता फिरता है।
महाराज ने आगे कहा कि देखो, शांति कभी भौतिक सुख साधनों और बाहरी जगत से नहीं मिल सकती। शांति का अहसास होना हमारे शुभ कर्मों का फल होता है। शुभ कर्म सोचने से नहीं, करने से होते हैं। इसका अंतर वैसे ही है जैसे साइंस में थ्योरी और प्रैक्टिकल में होता है।
मन में कई तरह के विचार आते रहते हैं। अच्छे विचार करते-करते मन में इच्छा होती है कि ऐसा काम करना चाहिए। बुरे विचारों से वैसे ही काम होते हैं, परंतु किसी मजबूरी, आलस्य वश, डर या असमर्थता के कारण हम अच्छे-बुरे विचारों अनुसार काम नहीं कर पाते। बुरे नहीं कर पाते यह अच्छी बात है परंतु अच्छे काम नहीं कर पाते, यह बुरी बात है।