डोडा (देसा गांव)। डोडा के देसा गांव की उन संकरी गलियों में कल तक उत्सव की हलचल थी। हर घर में चर्चा थी कि नन्हे का मुंडन है, सब साथ चलेंगे। पहाड़ों की ठंडी हवा में खुशियों की गर्माहट थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। आज उसी गांव में सन्नाटा इतना गहरा है कि सिसकियों की आवाज भी डरा रही है।
हादसे के बाद देसा गांव में आज एक भी घर ऐसा नहीं है जहां चूल्हा जला हो। पहाड़ के गांवों में रहने वाले लोगों का रिश्ता सिर्फ पड़ोस का नहीं, परिवार का होता है। जिस मुंडन के भोज के लिए पूरा गांव न्योता स्वीकार कर गया था, आज उसी गांव के लोग एक-दूसरे का चेहरा देख कर रो रहे हैं।
एक ग्रामीण ने रूंधे गले से बताया, कल हम सब खुश थे कि बच्चा बड़ा हो गया, उसकी मन्नत पूरी हो गई। किसे पता था कि जो बाल चढ़ाने जा रहे हैं, वो अपनी सांसें ही वहां छोड़ आएंगे।
वो ''खि़लौना'' जो अब कभी नहीं बजेगा
हादसे वाली जगह पर बिखरा सामान चीख-चीख कर उस मंजर की गवाही दे रहा है। कहीं मुंडन के लिए रखे फूल बिखरे हैं, तो कहीं बच्चों के नए कपड़े धूल में लिपटे हैं। सबसे ज्यादा पीड़ादायक वो छोटा सा खिलौना है, जो शायद उस मासूम के लिए खरीदा गया था जिसके सिर पर कल उस्तरा फिरना था। वो मासूम, जिसका चेहरा देखने के लिए कल पूरा गांव बेताब था, आज उसकी तस्वीर देख कर सबकी आंखें नम हैं।
एक ही चिता पर जलते सपने
एक ही परिवार के चार सदस्यों का चले जाना किसी वज्रपात से कम नहीं है। वह आंगन, जहां कल तक मंगल गीत गाए जा रहे थे, वहां आज रुदाली का शोर है। गांव की औरतें एक जगह बैठी पत्थर की मूरत बन गई हैं। जिस मां ने अपने बेटे या पोते के मुंडन के लिए सालों मन्नतें मांगी थीं, उसकी मन्नतें आज खाई की गहराइयों में दफन हो गईं।
बता दें, किश्तवाड़ जिले में शनिवार को कार खाई में गिरने से एक ही परिवार के चार लोगों की मौत हो गई थी। परिवार जिला मुख्यालय से करीब 29 किमी दूर सरथल स्थित माता के मंदिर में बच्चे का मुंडन कराकर लौट रहा था। सभी डोडा जिले के देसा के रहने वाले थे। मृतकों में रणजीत सिंह (42) निवासी मंगल ठाट्टा, देसा, ज्योति देवी (30) पत्नी रणजीत सिंह और उनका 18 माह का बेटा और रणजीत सिंह के भाई ओमप्रकाश की 21 वर्षीय बेटी सिमरन शामिल हैं।