रामबन। जिला प्रशासन रामबन ने बुधवार को 25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने के 50 वर्ष पूरे होने पर ''संविधान हत्या दिवस'' मनाया, जिसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक माना जाता है।
आपातकाल के दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं का व्यापक निलंबन, मौलिक अधिकारों में कटौती, संवैधानिक सुरक्षा उपायों का क्षरण और कार्यकारी शक्ति का अभूतपूर्व केंद्रीकरण हुआ। प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू की गई और इस दौरान हजारों राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज के सदस्यों को जेल में डाल दिया गया।
जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के अधिकारियों और प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में भाग लिया और अपने विचार साझा किए।
रामबन और बनिहाल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान, अधिकारियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा और भारत के संविधान में निहित अधिकारों की रक्षा के लिए अतीत से सबक लेने के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि हमारे इतिहास के इस काले अध्याय पर चिंतन करना और संविधान के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता की पुष्टि करना महत्वपूर्ण है। समानता का अधिकार जीवन का अधिकार और सम्मान का अधिकार जैसे अधिकार केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि संविधान के निर्माताओं द्वारा हमें दी गई जीवंत गारंटी हैं, जिनके प्रति हम कृतज्ञता के भाव से ऋणी हैं। इस वर्ष आपातकाल लागू होने के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जो न केवल स्मरण करने का अवसर है, बल्कि भारत के लोकतंत्र की लचीलापन और संविधान में निहित अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक नई प्रतिबद्धता पर गहन चिंतन का भी अवसर है। इससे पहले, विभिन्न वक्ताओं ने आपातकाल के संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थों पर प्रकाश डालते हुए व्यावहारिक व्याख्यान दिए। उन्होंने दोहराया कि इस अवधि में मौलिक अधिकारों का निलंबन, प्रेस पर सख्त सेंसरशिप और कार्यकारी शक्ति का अभूतपूर्व केंद्रीकरण देखा गया। हजारों राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज के सदस्यों को जेल में डाल दिया गया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों से गंभीर रूप से समझौता किया गया।
रामबन में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने संविधान हत्या दिवस मनाया और रैली निकाली
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