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Udhampur News: चिशोती त्रासदी के आठ माह पूरे... अब भी वादों की बुनियाद पर अनिश्चितता का पहाड़, मलबे में दबे सपनों और फाइलों में अटके पुनर्वास

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किश्तवाड़। हिमालय की गोद में बसा चिशोती गांव कभी प्राकृतिक सुंदरता और मचैल यात्रा के दौरान जयकारों के लिए जाना जाता था। लेकिन आज यहां की फिजाओं में सिर्फ सन्नाटा और अपनों को खोने का गम है। 14 अगस्त 2025 को बादल फटने की घटना को आठ महीने बीत चुके हैं लेकिन जख्म आज भी उतने ही हरे हैं। मलबे के नीचे दबे सपनों और सरकारी फाइलों में अटके पुनर्वास के बीच स्थानीय खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
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तबाही का मंजर गांव की ढलानों पर साफ देखा जा सकता है। जहां खुशहाल परिवार रहते थे वहां आज सिर्फ बड़े पत्थर और कीचड़ के निशान हैं। आंकड़ों के मुताबिक आपदा में 19 मकान और तीन मंदिर जमींदोज हो गए थे। मगर वास्तविकता कहीं अधिक भयावह है।



हरी सिंह और जमील सिंह की दास्तां सुनकर रूह कांप जाती है। हरी सिंह ने आपदा में परिवार के सात सदस्यों को खो दिया। वे बताते हैं कि प्रशासन ने उस वक्त बड़े वादे किए थे लेकिन आलम यह है कि कई प्रभावित परिवार एक ही छत के नीचे तीन-तीन परिवारों के साथ गुजर बसर करने को मजबूर हैं। सिर छिपाने की जगह नहीं है।
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निर्माण कार्य के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी



पुनर्वास को लेकर प्रशासन व सरकार की गंभीरता भी सवालों में है। तीन नवंबर 2025 को उपराज्यपाल मनोज सिन्हा चिशोती पहुंचे थे। उन्होंने आवास निर्माण की नींव रखी थी। वादा किया था कि गांव को आधुनिक तर्ज पर दोबारा बसाया जाएगा, सुरक्षा दीवारें बनेंगी और मंदिरों का निर्माण होगा। आठ माह बाद भी केवल शिलान्यास पत्थर दिखाई दे रहा है। निर्माण कार्य के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि सर्दी बीत गई, नया सीजन आ गया लेकिन प्रशासन की मशीनरी नहीं पहुंच पाई। स्थानीय विधायक सुनील शर्मा के आश्वासन भी अब तक कागजों तक सीमित हैं। केरल के एक एनजीओ ने फाइबर मकानों का वादा किया था जो धरातल पर नजर नहीं आ रहा।







मचैल माता के श्रद्धालुओं पर टिकी थी अर्थव्यवस्था



चिशोती की अर्थव्यवस्था मचैल माता के श्रद्धालुओं पर टिकी थी। हजारों यात्री यहां रुकते थे जिससे स्थानीय लोगों का रोजगार चलता था। इस बार 14 अप्रैल से शुरू हुई यात्रा की तस्वीर बदली हुई है। गांव के शिक्षक हुकुम चंद बताते हैं कि अब श्रद्धालु यहां रुकने से कतराते हैं। तीन बड़े मंदिर क्षतिग्रस्त हैं और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। नए पुल के निर्माण के बाद गाड़ियां सीधे दर्शनी द्वार तक जा रही हैं जिससे चिशोति एक बाईपास गांव बनकर रह गया है। वहीं प्रभावितों को मिली 2.35 लाख रुपये की सहायता राशि को कम बताया जा रहा है। लोगों का कहना है कि पहाड़ों पर इतने पैसों में नया मकान बनाना नामुमकिन है। ग्रामीणों का आरोप है कि पहले 10 लाख रुपये देने की बात कही गई थी।















भय के साये में जीवन



गांव के बीच से गुजरने वाला नाला आज भी ग्रामीणों को डराता है। आने वाले दिनों में जब ग्लेशियर पिघलेंगे तो जलस्तर बढ़ने का खतरा पैदा होगा। लेकिन सुरक्षा दीवार का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है। ग्रामीणों में प्रशासन के खिलाफ रोष तो है लेकिन एक अजीब सी हिचकिचाहट भी है। कई लोग कैमरे के सामने बोलने से डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे आवाज उठाएंगे तो सहायता की उम्मीद खत्म हो सकती है।
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