संवाद न्यूज एजेंसी
भद्रवाह। लगातार बारिश से वातावरण में आई नमी चीड़ और देवदार के जंगलों के लिए वरदान साबित हुई है। अनुकूल मौसम के कारण दुर्लभ कुंडी मशरूम (अर्थ कप फंगस) की बंपर पैदावार हुई जिसने स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की सैकड़ों महिलाओं के लिए दुर्लभ फंगस रोजगार का बड़ा जरिया बनकर उभरा है।
हिमालय की गोद में बसे भद्रवाह के जंगलों से पिछले कुछ वर्षों के दौरान सूखे के कारण स्वादिष्ट मशरूम लगभग गायब हो गया था। इस साल बर्फ पिघलने के बाद हुई लगातार बारिश ने जमीन को वह नमी दी जिसकी कुंडी को दरकार थी। वसंत की शुरुआत ने बुद्धा, चिंता, डुग्गी, कंसार, घुरका और मथोला जैसे दर्जनों गांवों की महिलाओं के चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी है। स्थानीय निवासी कल्याणा (67) के अनुसार पिछले दो-तीन साल से प्राकृतिक सौगात को लेकर निराश थे लेकिन इस बार भारी मात्रा में पैदावार होने से महिलाएं तड़के ही जंगलों की ओर निकल पड़ती हैं।
चिंता गांव के अजय कुमार (29) ने कहा कि बारिश ने जंगलों को कुंडी के खजाने में बदल दिया है। परंपरा के अनुसार महिलाएं इन्हें इकट्ठा करने के लिए जंगलों में जाती हैं क्योंकि ये घने देवदार के पेड़ों के बीच हर जगह बिखरे हुए मिल जाते हैं। कुंडी की बिक्री दूरदराज के इलाकों में रहने वाले परिवारों को रोजगार देती है।
बाजार में जबरदस्त मांग, 700 रुपये किलो तक भाव
बाजारों में इस समय कुंडी मशरूम की जबरदस्त मांग देखी जा रही है। महिलाएं जंगलों से इसे इकट्ठा कर 400 से 700 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बाजारों में बेच रही हैं। सब्जी विक्रेताओं के अनुसारइस साल बिक्री के पिछले रिकॉर्ड टूट गए हैं। हालात ऐसे हैं कि दुकानों पर सजने से पहले ही कुंडी के पैकेट बुक हो रहे हैं। स्थानीय ग्राहकों के अलावा दिल्ली जैसे बड़े शहरों से भी ऑर्डर मिल रहे हैं। स्थानीय विक्रेता अनिल कुमार ने बताया कि पिछले 20 दिन में उन्होंने लाखों का कारोबार किया है। वहीं इसे लाने वाली महिलाएं प्रतिदिन दो से तीन हजार रुपये तक कमा रही हैं।
औषधीय गुणों और स्वाद से भरपूर
कुंडी मशरूम न केवल अनोखे स्वाद के लिए मशहूर है बल्कि इसे औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। छायादार और नमी वाली जगहों पर उगने वाली फंगस का इस्तेमाल स्थानीय व्यंजनों में विशेष तौर पर किया जाता है। घने जंगलों में बिखरी कुंडी न केवल परिवारों को आर्थिक सहारा दे रही है बल्कि शांत रहने वाले देवदार के जंगलों को भी चहल-पहल से जीवंत बना दिया है। प्रशासन और स्थानीय लोग प्राकृतिक आपदा के बीच मिले आर्थिक अवसर को क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।