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कब बदलेगा नजरिया?: 'पुलवामा के गुनहगार आतंकी....हम नहीं', टॉपर के पिता ने दर्द किया बयां

Fri, 26 Jun 2026 01:28 PM IST
Nikita Gupta विवेकानंद त्रिपाठी, संवाद न्यूज एजेंसी, श्रीनगर

सार

पुलवामा की मेधावी छात्रा सना बराक की सफलता और उनके पिता के अनुभवों से उस मानसिकता पर सवाल उठाया गया है, जिसमें क्षेत्र विशेष के लोगों को संदेह की नजर से देखा जाता है।
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अमर उजाला मेधावी छात्र सम्मान समारोह - फोटो : संवाद
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विस्तार
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आठ बरस पहले की वह काली घटना देश के मर्म पर एक गहरा घाव थी। बीएसएफ के चालीस रणबाकुरों को खोने का दर्द आज भी राष्ट्र की चेतना में जीवित है। उस समय देश का जनमानस प्रतिकार की आग में जल रहा था और एक स्वाभिमानी राष्ट्र ने अपना उत्तर भी दिया। लेकिन इन आठ वर्षों के बाद पुलवामा से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं।

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श्रीनगर में आयोजित अमर उजाला के एक मेधावी सम्मान समारोह में 12वीं विज्ञान वर्ग में 99.4 प्रतिशत अंक लाने वाली सना बराक और उनके पिता फैजल यासीन गनी से मुलाकात हुई। सना की सफलता कोई साधारण उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह कदम कदम पर खुद को साबित करने की एक अंतहीन जंग है। लेकिन उनके पिता की बातों से जो दर्द उभर कर आया, वह किसी भी मेडल की चमक से कहीं अधिक भारी है।

फैजल ने बयां किया कि जब उनके बच्चे कश्मीर से बाहर मुल्क के किसी अन्य हिस्से में पढ़ने जाते हैं, तो लोग उन्हें शक भरी निगाहों से देखते हैं। उन्हें ऐसे महसूस कराया जाता है मानो पुलवामा की उस घटना के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हों। उनके गले में भले ही सफलता के मेडल चमक रहे हों, लेकिन लोगों की निगाहें उनके बैग में बम तलाशती हैं। यह एक ऐसी मानसिक प्रताड़ना है जो एक मेधावी युवा के हौसलों को अंदर तक तोड़ देती है।

यह आज का कड़वा चलन बन गया है कि किसी एक स्थान या वर्ग विशेष की करतूतों के लिए पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। सना जैसे बच्चे पूछ रहे हैं कि क्या उनका कसूर सिर्फ यह है कि वे पुलवामा में पैदा हुए हैं।

यदि किसी समाज की मानसिकता किसी युवा की मेधा पर भारी पड़ने लगे, तो यह उस युवा की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है। क्या हम अपनी सोच बदलने के लिए तैयार हैं? जब तक हम इंसान को उसकी पहचान से नहीं बल्कि उसके काम और उसकी योग्यता से नहीं परखेंगे, तब तक हम अपनी असली प्रगति से दूर रहेंगे। पुलवामा के इन होनहारों का दर्द हमारा अपना दर्द होना चाहिए।
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