श्रीनगर में आयोजित अमर उजाला के एक मेधावी सम्मान समारोह में 12वीं विज्ञान वर्ग में 99.4 प्रतिशत अंक लाने वाली सना बराक और उनके पिता फैजल यासीन गनी से मुलाकात हुई। सना की सफलता कोई साधारण उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह कदम कदम पर खुद को साबित करने की एक अंतहीन जंग है। लेकिन उनके पिता की बातों से जो दर्द उभर कर आया, वह किसी भी मेडल की चमक से कहीं अधिक भारी है।
फैजल ने बयां किया कि जब उनके बच्चे कश्मीर से बाहर मुल्क के किसी अन्य हिस्से में पढ़ने जाते हैं, तो लोग उन्हें शक भरी निगाहों से देखते हैं। उन्हें ऐसे महसूस कराया जाता है मानो पुलवामा की उस घटना के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हों। उनके गले में भले ही सफलता के मेडल चमक रहे हों, लेकिन लोगों की निगाहें उनके बैग में बम तलाशती हैं। यह एक ऐसी मानसिक प्रताड़ना है जो एक मेधावी युवा के हौसलों को अंदर तक तोड़ देती है।
यह आज का कड़वा चलन बन गया है कि किसी एक स्थान या वर्ग विशेष की करतूतों के लिए पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। सना जैसे बच्चे पूछ रहे हैं कि क्या उनका कसूर सिर्फ यह है कि वे पुलवामा में पैदा हुए हैं।
यदि किसी समाज की मानसिकता किसी युवा की मेधा पर भारी पड़ने लगे, तो यह उस युवा की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है। क्या हम अपनी सोच बदलने के लिए तैयार हैं? जब तक हम इंसान को उसकी पहचान से नहीं बल्कि उसके काम और उसकी योग्यता से नहीं परखेंगे, तब तक हम अपनी असली प्रगति से दूर रहेंगे। पुलवामा के इन होनहारों का दर्द हमारा अपना दर्द होना चाहिए।