अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बताया कि शुरू में वह एजुकेशन, समुदाय पर आधारित पुनर्वास, अनाथ बच्चों के लिए काम कर रही थीं और श्रीनगर, बड़गाम जिले के कई हिस्सों में जाती थीं। उन्होंने जब यह पाया कि कई युवतियां गरीबी के चलते और कई अनाथ होने के कारण शादी नहीं कर पाई हैं। पहले तीन-चार लड़कियों की शादी करवाई, लेकिन बाद में सर्वे किया तो बड़ी संख्या में ऐसी युवतियां पाई गईं, जिनकी शादियां नहीं हो पा रही थीं। घाटी में ऐसा पहली बार हुआ जब लड़कियों की सामूहिक शादियां करवाई गई हो। लोगों ने भी इस प्रयास की सराहना की और यह सिलसिला आज भी जारी है।
अभी तक चार बार सामूहिक विवाह के समारोह कराए गए हैं और करीब 300 से अधिक शादियां करवाई गई हैं। सबसे बड़ी दिक्कत कश्मीरी समाज में वाजवान की है, जिसमें कश्मीरी शादियों में सबसे ज्यादा खर्च होता है उसे भी हटा दिया गया। शादियों में केवल केहवा, बेकरी और बिरयानी रखी गई। उन्होंने पांचवां सामूहिक विवाह तलाकशुदा महिलाओं के साथ-साथ विधवाओं के लिए रखा है। कहा कि ऐसी महिलाओं का आज के समाज में गुजर बसर करना मुश्किल है, इसलिए अगला प्रयास इसका है।